अमृतवाणी-192
एक अन्य समय माँ एक धार्मिक उत्सव में विराजित थीं। अकस्मात् उठ कर वे मण्डप से बाहर जाने लगीं। दीदी तथा एक दो अन्य अनुयायी भी माँ के पीछे-पीछे बाहर आ गये। माँ सीधे रेल्वे स्टेशन पर पहुँचकर सामने खड़ी रेलगाड़ी में चढ़ गईं। गाड़ी के प्रस्थान करने के कुछ समय पश्चात् माँ एक छोटे स्टेशन पर उतर गईं। (सामान्यतः यह रेल गाडी उस स्थान पर नहीं ठहरती थी) तीव्र गति से चलते हुये माँ नगर के मध्य में स्थित एक धर्मशाला में पहुंची, वहाँ किसी से निर्देश पूछे बिना सीधे एक कक्ष में प्रविष्ट हो गईं। विभ्रमित से माँ के साथ आये सभी व्यक्ति भी माँ के पीछे-पीछे चल रहे थे। धर्मशाला के उस कक्ष में एक महिला शय्या पर बैठी करूण विलाप कर रही थी। माँ ने स्नेह पूर्वक उससे कहा “विलाप मत करो, देखो मैं आ गई हूँ।” आश्चर्यचकित महिला के शोकाश्रु आनन्द एवं कृतज्ञता के अश्रुओं में परिवर्तित हो गये। कुछ शान्त होने पर उसने दीदी को बताया कि वह इस नगर में माँ के आगमन का समाचार पाकर यहाँ आई थी। किन्तु माँ किसी दूरस्थ स्थान पर हैं, ऐसा ज्ञात होने पर वह इस कमरे में एकाकी बैठ कर शोकाकुल हो आंसू बहाते हुए आर्त्तभाव से, माँ को पुकार रही थी। माँ के समक्ष देश, व काल का कोई अस्तित्व नहीं है वे भक्त की हृदयगत, आर्त पुकार का सदैव प्रत्युत्तर देती हैं। माँ कहती हैं, “तुम्हारा दुःख, तुम्हारी पीड़ा, तुम्हारा संताप मेरा ही दुःख है। यह शरीर सब कुछ समझता है।” (माँ प्रायः स्वयं को “यह शरीर” कहकर इंगित करती थीं। उन्हे ईश्वर से भिन्न अपने अस्तित्व का भान कदापि नही था)
साभार:
"एक दिव्य शक्ति हमारे समीप"
"आनन्दमयी मॉ का दैनिक जीवन पुस्तक से"
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