सलाखों के अन्दर गायत्री साधना-56
यादों के झरोखे में एक नाम और याद आता है सेवक राम। किसी गारमैन्ट फैक्ट्री में काम करता था अपने शहर से दूर। यहां तक कि स्टेट से भी दूर। बहुत ही मेहनती, ईमानदार। लेकिन भाग्य के लिखे को कौन टाल सकता है। अच्छी-खासी नौकरी चल रही थी , सिलाई का काम करता था। प्राइवेट नौकरी में पैसा देर सवेर मिलना आम बात थी,लेकिन किसी-किसी को ओवरटाइम कराकर ज्यादा पैसे दिला देना उसे बहुत अखरता था। इस बारे में वह कई बार मुनीम जी से कहा भी, लेकिन वह डॉट कर काम पर लगा देता। उसे समझ नहीं आ रहा था कि करे भी तो क्या ? धीरे-धीरे
उसकी नफ़रत मुनीम के प्रति और ज्यादा बढ़ती जा रही थी क्योंकि वह लड़कियों के प्रति रुझान रखता था, तथा जो लड़की उसके कहने में आ जाती, उसे ओवरटाइम कराकर ज्यादा पैसे दिला देता। फैक्ट्री में यह बात सभी जानते थे, लेकिन सभी मन मसोसकर रह जाते या सेवक को झगड़ने के लिए आगे कर देते।
इस तरह समय निकलता रहा कि एक दिन काम का बोझ ज्यादा दे दिए जाने का कारण पूछने जब वह मुनीम के कमरे में दाखिल हुआ तो मुनीम को आपत्तिजनक स्थिति में देखा, देखते ही वह अपना आपा खो बैठा और मुनीम को हाथ में पकड़ी हुई कैंची से ताबड़-तोड़ वार करके मार डाला। उसके बाद थाने में जाकर पूरी घटना बयां कर दी।
इस सबके बाद कारागार में आ गया। कुछ समय बाद गायत्री मन्दिर आने लगा। चुपचाप बैठा रहता न किसी से बातचीत न कुछ और। दूर बैठा यज्ञ देखता रहता। धीरे-धीरे झिझक दूर हुई तो गायत्री मंत्र बोलना सीख लिया और यज्ञ भी करने लगा। बाद में तो यथा नाम तथा गुण: वाली स्थिति हो गई, मन्दिर के छोटे-बड़े कामों को बड़ी ही श्रद्धा से करता। कोई वकील नहीं केस लड़ने के लिए उसका ? लेकिन उसका भरोसा गुरुदेव-माताजी थे। वह अक्सर कहने लगा कि मेरी वकालत गुरुदेव ही करेंगे। आजीवन कारावास की सजा में था लेकिन कोई चिंता नहीं कि क्या होगा और कब होगा ? बहुत ही बेफिक्र इंसान ।
मन्दिर सेवा और जप-ध्यानकरते-करते काफ़ी साल बीत गए, उसके सामने कुछ लोग बरी भी हो गये, जब भी कोई उसे पूछता कि तेरा क्या हुआ केस का ? तो तुरंत जबाब देता-गुरुदेव लड़ रहे हैं, जब फैसला आ जायेगा तो जीजी के घर रहने भेज देंगे। सभी लोग पागल समझकर हँसने लगते। हम भी करें तो क्या, कई वकीलों से बात भी की, लेकिन कुछ नहीं बैठा। हत्या की बात सुनकर वकीलों के भाव बढ़ जाते,
अनाप-शनाप फीस मॉगने लगते जो हमारे भी वश के बाहर थी। एक दिन ख़ुद ही बोला-जीजी आपको गुरुदेव पर भरोसा नहीं है लेकिन मुझे है, आज के बाद आप किसी वक़ील से बात मत करना। मैं चौदह साल की सज़ा नहीं काटुँगा, उससे पहले ही गुरुदेव मुझे बाहर निकाल देंगे। हम लोग उसकी बात सुनकर चुप हो जाते और मन ही मन गुरुदेव से प्रार्थना करते कि
इसकी लाज रखना।
लगभग 9 साल सज़ा भुगतने के बाद एक दिन रात में अचानक फ़ोन आया कि मैं सेवक बोल रहा हूँ, मुझे घर का पता दो, मुझे घर आना है, मैं बरी हो गया हूँ। हम लोग उसके विश्वास के आगे नतमस्तक थे। इसके बाद वह दो माह तक हम सबके साथ रहा,बाद में चला गया। गुरुदेव-माताजी की अनन्य कृपा उस पर
हमेशा बनी रहे, इसी कामना के साथ!!
क्रमशः!!
'गुरुकॄपा केवलम्'
"गुरुवर शरणम् गच्छामि"
👣🙏
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