सलाखों के अन्दर गायत्री साधना-57

गुरुदेव माताजी के बहादुर हीरो जिनमें ताकत और दिमाग तो बहुत था लेकिन दिशा सही न मिल पाने के कारण जीवन में बहादुरी के काम तो बहुत किये किन्तु
अनर्थ वाले ज़्यादा। उन्हीं में से एक नाम था बलवीर यादव (परिवर्तित नाम) पटना का रहने वाला था, हालात ने उसे बम्बई पहुँचा दिया।वहॉ जाकर बेलदारी की कुछ दिनों तक, फिर ठेकेदार बन गये ,पहचान बढ़ी तो प्रॉपर्टी के छोटे-छोटे धन्धे से पैसा कमाने लगा। धीरे-धीरे व्यवसाय बढ़ने लगा, तो पैसा और रुतबा भी बढ़ने लगा। कहते हैं कि जब पैसा और रुतबा बढ़ने लगे तो सही दिशा भी मिलनी चाहिए अन्यथा भटकने की संभावना अधिक होती है।
               ऐसा ही कुछ बलवीर के साथ भी हुआ। व्यापार बढ़ने पर व्यस्तता एवं क्रोध भी बढ़ने लगा। छोटी-छोटी बातों पर क्रोध आ जाना हाथापाई कर बैठना उसकी आदत में शुमार हो गया। प्रॉपर्टी डीलर के साथ-साथ बिल्डर भी बन गया, लेकिन स्वभाव उग्र
होता गया। घर वाले बहुत समझाते लेकिन वह समझना ही नहीं चाहता था। पैसे का नशा सिर चढ़कर बोल रहा था। देर रात घर में घुसना, सुबह उठते ही घर
से निकल जाना, बस यही क्रम बन गया था उसका।           
                      बेलदारी से शुरू हुआ जीवन अब रईसों में गिना जाने लगा। दिन-रात पैसा कमाने की धुन। घर, गाड़ी इत्यादि समस्त सुविधाओं से युक्त शानो-शौकत का शौकीन। लेकिन गुस्से का ज़हर भी   बढ़ रहा था। तमाम कर्मचारियों पर ऐसी हुकूमत कि
बात करते डर लगे। कोई उसे पलटकर जबाब दे यह
उसे कतई गवारा नहीं था। स्टॉफ के भीतर नफ़रत घुलने लगी और एक दिन किसी बात पर स्टॉफ के एक
कर्मचारी ने उसे गुस्से में बुरा-भला कह डाला, फ़िर क्या था। अंहकार के सॉप ने फन निकाल लिया। बलवीर ने उसे इतना मारा कि उस कर्मचारी के प्राण-पखेरू उड़ गये। पुलिस को पैसा खिलाकर और
उसके घर वालों पर दबाव डालकर वह बच निकला।
                    इस तरह समय के साथ उसका दबदबा बढ़ता गया और हिम्मत भी खुलती गई। बाद में उसने चार लोगों को और मार डाला। जब गर्दन में ख़ुद के फन्दा डला तो बचकर भाग निकले और किसी तरह राजस्थान पहुँच गए। इधर आकर नौकरी कर ली, दो साल जैसे-तैसे ठीक-ठाक निकाले और अन्त में यहाँ भी एक मर्डर। इस तरह कुल पॉच लोगों को मारकर जेल में आना पड़ा। जेल में आने के बाद भी शानो-शौकत का जीवन उसे बार-बार याद आता। बन्दी भाइयों पर अपनी हेकड़ी जताता। जैसे-तैसे कुछ
बन्दी भाई उसे गायत्री मन्दिर ले आये,यज्ञ में शामिल हुआ, बात-चीत के दौरान उसने उपरोक्त विवरण बताया,तथा कहने लगा कि बहुत जल्दी निकल जाऊँगा यहाँ से। दुनिया की कोई ताकत मुझे यहाँ नहीं
रोक सकती।
      कहते हैं कि समय बहुत बलवान होता है। आजीवन कारावास की सजा हो गई। फूट-फूट कर रोया। मन्दिर आता चुपचाप बैठा रहता। बहुत समझाने के बाद हिम्मत आई, मन्दिर की सेवा में लग गया। पूरा दिन गुरुदेव माताजी के चरणों की सेवा।मन्दिर की साफ़ सफ़ाई में लगा रहता। उग्र स्वभाव मौन में बदल  गया। पता नहीं गुरुदेव माताजी ने क्या कहा कि अचानक से दीक्षा देने की ज़िद करने लगा। बहुत मुश्किल से गुरु पूर्णिमा तक इन्तज़ार करने के लिये तैयार किया। आख़िर वह दिन भी आ गया जब उसे दीक्षा दी गई। दीक्षा लेते समय लगातार रोता रहा, जब
एक बुराई छोड़ने का संकल्प दिलाया तो बोला-जीजी
क्या संकल्प लूँ, बस एक वादा करता हूँ गुरुजी से कि
अब किसी की हत्या नहीं करूँगा। जबकि सोचा तो ये था कि आठ-दस को और मारना है। लेकिन जब गुरुजी ने मुझे माफ करके आज अपना लिया, तो उनकी इज्जत का हमेशा ख़याल रखूँगा।   
     जेल में सभी की सहायता करना उसका स्वभाव बन गया था। पागलों एवं बच्चों के बाड़े में जाकर उनकी सेवा करता, गायत्री मंत्र बुलवाता। बहुत व्यस्त रहने लगा था वो। गुरुदेव माताजी की कृपा सतत् उस पर बनी रहे इसी प्रार्थना व यादों के साथ।
                                    क्रमशः!!
                             'गुरुकॄपा केवलम्'
                        "गुरुवर शरणम् गच्छामि"
                                    👣🙏

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