अमृतवाणी-191
“एक साधु मेरे घर पर भोजन मांगने आया। मैंने उसे अंदर बुलाया, कुछ भोजन दिया और उससे वही प्रश्न पूछा जो कि हर समय मेरे मन में घूमता रहता था, ‘क्या आप मुझे ईश्वर के दर्शन करा सकते हैं? अगर नहीं तो क्या आप किसी ऐसे को जानते हैं जो दर्शन करा सकता हो?’ और मेरे आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा जब उसने उत्तर हां में दिया, ‘हां, मैं एक व्यक्ति को जानता हूं जो आपको ईश्वर के दर्शन करा सकता है। यदि आप जाएं और उससे मिलें तो आपके लिए सब कुछ ठीक हो जायेगा। उनका नाम रमण महर्षि है।’ “मैंने उस साधु की सलाह मानी और रेल से तिरुवण्णामलै के लिए रवाना हो गया। वहां उतरने पर पता चला कि महर्षि का आश्रम शहर के उस पार करीब तीन किलामीटर दूर है। इसलिए अपने सामान और खुद के लिए मैंने एक बैलगाड़ी की। जैसे ही मैं आश्रम पंहुचा, मैं तुरंत बैलगाड़ी से कूद कर उतरा, अपना सामान पुरुष-डोरमिटरी में पटका और उस व्यक्ति की तलाश में निकल पड़ा जो मुझे ईश्वर के दर्शन करा सकता था। मैंने उनकी खिड़की से झांक कर देखा।
अंदर सोफ़े पर जो बैठा हुआ था वह वही आदमी था जो मेरे घर आया था — पंजाब में … श्री रमण महर्षि! मैं जैसे लड़ने के मूड में उनके सामने जा पहुंचा और पूछा, ‘क्या आप वही आदमी हैं जो पंजाब में मेरे घर आया था?’ महर्षि मौन रहे। मैंने फिर पूछा, ‘क्या आप ही मेरे घर आए थे और मुझसे यहां आने के लिए बोला था? क्या आप वही आदमी हैं जिसने मुझे यहां भेजा है?’ इस पर भी महर्षि कुछ नहीं बोले। चूंकि वह मेरे इन दोनों ही सवालों के जवाब देना नहीं चाह रहे थे, इसलिए मैं वहां आने के अपने प्रयोजन पर आ गया और पूछा, ‘क्या आपने ईश्वर को देखा है? अगर हां तो क्या आप मुझे भी ईश्वर दिखा सकते हैं? मैं कोई भी कीमत देने को तैयार हूं, अपना जीवन भी, लेकिन सौदा इसी बात पर होगा कि आप मुझे ईश्वर का दर्शन करायेंगे।’ “वह बोले, ‘नहीं, मैं तुम्हें ईश्वर नहीं दिखा सकता और न ही तुम्हें ईश्वर देखने योग्य बना सकता हूं क्योंकि ईश्वर कोई वस्तु नहीं है जिसे देखा जा सकता हो। ईश्वर तो कर्ता है। वह तो द्रष्टा है। उस सब से सरोकार रखना छोड़ दो जिन्हें देखा जा सकता है। उसे जानो जो द्रष्टा है।’ फिर उन्होंने आगे कहा, ‘तुम ही ईश्वर हो’, वे जैसे मुझे झिड़कते हुए रहे थे कि मैं किसी ऐसे ईश्वर को खोज रहा हूं जो मुझसे बाहर और अलग है। अपनी बात को पूरा कर लेने के बाद उन्होंने मेरी तरफ़ देखा और सीधे मेरी आंखों में देखा। तब मेरा पूरा शरीर कंपायमान हो
गया। एक प्रबल ऊर्जा की तरंग मेरे पूरे शरीर में बहुत तेज़ी से घूम गई। लग रहा था जैसे मेरी तंत्रिकाओं के छोर नाच रहे हैं। मेरे सिर के बाल अपनी जड़ों पर खड़े हो गए थे। अपने भीतर मुझे आध्यात्मिक हृदय का बोध हुआ। वह शारीरिक हृदय नहीं होता। बल्कि, वह तो जो कुछ भी अस्तित्व में है उस सब का स्रोत और संबल होता है। उस हृदय के अंदर जो मैंने देखा या महसूस किया वह कुछ ऐसा लगा जैसे वहां कोई एक बंद कली है। वह बहुत चमकीली थी और उसमें नीलिमा थी। तब वहां थे बस मुझे देखते हुए महर्षि और अपनी भीतरी नीरवता में मैं, इस सब के बीच मुझे वह कली खुलती और खिलती लगने लगी थी। मैं उसे ‘कली’ कह तो रहा हूं लेकिन यह उसके लिए सही शब्द-चित्रण नहीं है, बल्कि यह कहना अधिक उचित होगा कि कोई कली जैसे रुप-आकार की एक चीज़ हृदय में खुल और खिल गई थी। और यहां ‘हृदय’ से मेरा तात्पर्य यह नहीं है कि यह खुलना शरीर के किसी अंग विशेष में हो रहा था। वह हृदय, मेरे हृदय का भी हृदय, न तो मेरे शरीर के अंदर था और न ही बाहर था। सच बात तो यह है कि जो कुछ उस दिन घटित हुआ था उसका ज्यों का त्यों वर्णन तो मैं कर ही नहीं सकता।
श्री हरवंश लाल पूजा
(श्री रमण महर्षि परम गुरु पुस्तक से साभार)
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