अद्भुत आश्चर्यजनक किन्तु सत्य-27
उन दिनों मैं सिविल कोर्ट में,बलरामपुर में सर्विस कर रही थी। जून में कोर्ट की छुट्टियाँ होने को थीं। सन् 2002 की बात है।इस बार हमने शान्तिकुन्ज में छुट्टियाँ बिताने की सोची। पहले तो कई लोग आने को तैयार थे, पर बाद में उन सभी ने अलग-अलग कारणों से अपना प्रोग्राम बदल दिया और मैं अकेली रह गई। छुट्टियों के दिन होने के कारण ट्रेन में रिजर्वेशन नहीं मिल पाया था। किन्तु मुझे तो किसी भी हाल में शान्तिकुन्ज पहुँचना ही था। मन में ठान चुकी थी। सो,अकेली ही रवाना हो गई। गोण्डा से ट्रेन से चारबाग रेलवे स्टेशन, लखनऊ पहुँची,तो शाम के चार बज चुके थे। दून एक्सप्रेस से जाना था। लेकिन, स्टेशन पर यात्रियों की भारी भीड़ देखकर मैं अन्दर से कॉप उठी।
प्लेटफार्म पर पैर रखने की जगह नहीं थी। नतीजा यह हुआ कि ट्रेन छूट गयी। इसके बाद वाली ट्रेन जनता एक्सप्रेस में भी नहीं सकी। पता चला कि इसके बाद रात में कोई और ट्रेन नहीं है। मैं स्टेशन पर चिन्तित बैठी थी। सोच रही थी कि काश, यह समाचार झूठा होता, संयोगवश कोई ट्रेन आ जाती।
रात गहरी होती गई। स्टेशन पर से भीड़ घटती जा रही थी। मेरा भय लगातार बढ़ता जा रहा था पूरी रात मैं प्लेटफार्म पर अकेली कैसे रहूँगी ? यहाँ किसी को जानती भी नहीं कि उसके घर जाकर रात बिता सकूँ। चोर- उचक्के ही आ जायें या अकेली औरत देख किसी पर बदनीयती ही सवार हो जाये,तो क्या करूँगी। मन बार-बार यह कहने लगा कि मुझे अकेले नहीं आना चाहिए था। आये दिन कितनी ही
उल्टी-सीधी घटनाएं घटती रहती हैं। अखबारों में रोज ऐसी ही खबरें छपती हैं। दस की भीड़ में पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करना अलग बात है, पर यहाँ सुनसान रात में अनजान स्टेशन के प्लेटफार्म पर रहना.....! यही सब सोचकर मैं अन्दर ही अन्दर कॉप रही थी।
इतने में एक आदमी पास आकर खड़ा हो गया। मुझे रंग-ढ॔ग ठीक नहीं लग रहे थे। वह मुझसे पूछने लगा-कहॉ जाना है ? मैंने उपेक्षापूर्ण स्वर में कहा- हरिद्वार । उसने बात आगे बढ़ाने की चेष्टा की-मैं रेलवे का इम्प्लाई हूँ । हरिद्वार की आख़िरी ट्रेन भी जा चुकी है। अब वहां के लिए कोई ट्रेन आपको कल ही मिलेगी। मेरा रहा सहा होश भी गुम होने लगा।वहां से उठकर मैं टी स्टॉल के पास वाली बैंच पर बैठ गई। थोड़ी देर बाद वह आदमी मेरे पास आकर बैठ गया। मैं बुरी तरह डर गई थी। जब और कोई उपाय नहीं दिखा,
तो ऑखें मूँदकर गुरुदेव का ध्यान करने लगी। मन ही मन उनसे प्रार्थना करते हुये बोली- "हे गुरुदेव, अकेले ही घर से निकल कर मैंने बहुत बड़ी ग़लती की है,अब तो आप ही मेरी लाज बचा सकते हैं।" मैं परेशान होकर इधर-उधर टहल रही थी। मेरी ऑखों में ऑंसू भरे हुये थे। मैं रोना चाहती थी, किन्तु रो नहीं रही थी। मैं टहलते हुए स्टेशन के दूसरे छोर के पास पहुँच गई। मैं एक खंभे के पास खड़ी हो गई। मैं डरी हुई थी।चूँकि वह व्यक्ति आस-पास ही रह रहा था।
मैंने देखा खम्भे के पास जहाँ थोड़ी जगह होती है वहीं पर एक बूढ़े दम्पति को बैठे हुए देखा। उनके पास दो छोटी-छोटी गठरियॉ थीं। उन्हें देखकर मैं उन्हीं के पास खड़ी हो गई। मुझे उनके पास खड़े होने पर लग रहा था। जैसे गुरुदेव मेरी करुण पुकार सुनकर स्वयं आ गये हों। मैं भी थोड़ी जगह पर बैठ गई,थोड़ी देर में बात-चीत के क्रम में उन्होंने कहा कि-"बेटी क्या बात है ? कुछ परेशानी है क्या ?" मैंने
कहा कि बाबा मुझे हरिद्वार जाना है। किन्तु हरिद्वार की दोनों रेलें जा चुकी हैं मैंने पता किया, तो मालूम हुआ कि हरिद्वार के लिए कोई ट्रेन नहीं है मैं बहुत परेशान हूँ। पूरी रात स्टेशन पर क्या करूँगी ? बाबा बोले-इसमें चिन्ता की क्या बात है । तुम्हें हरिद्वार ही जाना है। अभी एक ट्रेन आयेगी इसी प्लेटफार्म पर, जो सहारनपुर जायेगी। तुम लक्सर स्टेशन पर उतर जाना,वहॉ से हरिद्वार के लिए कोई न कोई ट्रेन मिल जायेगी।
पूरी रात स्टेशन पर बैठने से अच्छा है कि ट्रेन में रहोगी। उनकी बात मुझे अच्छी लगी किन्तु विश्वास नहीं हो रहा था कि ये जो कह रहे हैं वह सही है। चूँकि उनकी वेशभूषा से नहीं लग रहा था कि ज्यादा पढ़े लिखे होंगे। इनको कैसे पता चला कि कौन सी ट्रेन आ रही है? किन्तु न जाने क्यों मुझे उनकी बातों में सच्चाई लग रही थी। उनकी वाणी में अजीब सी मिठास एवं अपनापन झलक रहा था। मैंने कहा-बाबा आप सच कह रहे हैं। वो तो मैं सही बोल रहा हूँ, मुझे भी हरिद्वार जाना है। अभी 10.30 बजे ट्रेन आयेगी।
मैंने सोचा इन्तज़ार करने में क्या हर्ज़ है अभी सच्चाई तो पता चल ही जायेगी। 30-35 मिनट की बात है लेकिन उस स्थिति में एक-एक मिनट पहाड़ जैसी बीत रही थी। आख़िर 10.30 बजे वह ट्रेन आई।मैं अपना बैग लेकर बाबा के साथ चल दी ट्रेन में चढ़ने के लिए। मैंने सोचा कि बाबा बूढ़े हैं इनकी सहायता करनी चाहिए इसलिए मैंने कहा-बाबा, पहले आप चढ़ जाईये तब मैं चढ़ूँगी। तो बाबा बोले-पहले तुम चढ़ो तुम मेरी चिन्ता मत करो। मैं ट्रेन में चढ़ गई। ट्रेन में काफ़ी भीड़ थी मैंने सोचा बाबा इसी ट्रेन में होंगे, लेकिन आस-पास मुझे वह बाबा दिखाई नहीं पड़े। मैं रात भर ट्रेन में बैठी रही। मुझे हल्की-हल्की झपकी लग जाये, तो मैं जाग जाती थी। चूँकि मुझे लक्सर स्टेशन पर उतरना था। पहली बार स्टेशन का नाम सुना था कि कहीं भूल न जाऊँ। मैंने ट्रेन में बैठे व्यक्तियों से भी स्टेशन के बारे में पूछा। दूसरे दिन मैं लक्सर स्टेशन पर
उतर गई। मैंने इन्क्वायरी में जाकर हरिद्वार के लिए ट्रेन पूछी तो पता लगा अभी एक घन्टे बाद ट्रेन आयेगी।
इस प्रकार गुरुकृपा से हरिद्वार आ गई। जब भी मैं इस घटना के बारे में सोचती हूँ मेरा हृदय गुरुवर के प्रति श्रद्धा से भर जाता है गुरुदेव की कृपा का कर्ज मैं इस जन्म में नहीं चुका सकती।
प्रस्तुति: अर्चना सिंह
बलरामपुर (उ.प्र.)
साभार:
(अद्भुत आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से पृष्ठ -11)
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें