गुरुगीता-96
यह कथा सन् 1952 की है । अघोरेश्वर भगवान राम जी ने हरिहरपुर में सर्वप्रथम 'विष्णु-यज्ञ' आयोजित किया । इस यज्ञ में,' झूंसी के नाथ बाबा' के लिए सबसे ऊंचा आसन स्थापित किया गया । यह यज्ञ शुरू होने के २-३ दिन पहले , बनारस जिला के सब-डिवीजन मजिस्ट्रेट पूज्य अघोरेश्वर से मिलने के लिए पहुंचे ।
एस.डी.एम. साहब बड़े रूतबे में आये,और बिना जूता उतारे ,नाथ-बाबा के आसन पर बैठ गये। कई सेवकगण समझाने गये, लेकिन एस.डी.एम, साहब उनकी बात सुनकर बिगड़ गये, और बोले ,"अरे हटो! हम बाबा-माई बहुत देखे हैं।" इसकी सूचना महाप्रभु को दी गई , पूज्य अघोरेश्वर ने आदेश दिया कि आपलोग पुनः एस.डी.एम.साहब से विनती करें। पर विनती का कोई असर नहीं हुआ। इस ढिटाई का पता महाप्रभु को चला। आपने कहा,"अच्छा ! तो ऐसी बात है ?" बाबा ने उठकर झंडी-पताका में से 1-बांस उखाड़ लिया। इतना होते ही एस.डी.एम. साहब आसन के उपर धड़ाम से जमीन पर आ गिरे !
एस.डी.एम.साहब तमतमाते हुए पास के पुलिस चौकी पर गये। चौकी - इंचार्ज से बाबा को गिरफ्तार करने का आदेश दिया। "थाना-इंचार्ज ने कहा त्यागपत्र दे सकता हूँ परंतु यह काम नहीं कर सकता हूँ ।" इस जबाब को सुनकर एस.डी.एम. साहब चहनिया से चंदौली पुलिस चौकी पहुंचे।पर यहां भी वही ज़बाब मिला। तब एस.डी.एम.साहब पी.ए.सी.की २ -गाड़ियों में जवान भरकर वापस लौटे । जैसे ही जीप यज्ञ-भूमि की सड़क पर चढ़ी-बिना किसी आंधी-तूफान के उलट गई!जीप ऊपर और एस.डी.एम.साहब उसके नीचे।
तब उनका माथा ठनका,और उनको महाप्रभु की महिमा समझ में आने लगी । किसी तरह बाहर आये और ग्लानि का भाव लिए लोगों से बाबा से मिलने का आग्रह किया।
जैसे ही यह बात महाप्रभु तक पहुंची, "बाबा उनको तुरंत, एक-मिनट भी विलंब किये बिना, उनके पास पहुंचे ।' पूज्य अघोरेश्वर ने उनसे कहा," दर्शन तो आप बाद में कीजियेगा । अभी आप जितना तेजी से जीप दौड़ा सकते हैं, उतनी तेजी से दौड़ाकर कबीरचौरा अस्पताल जाइये। वहां आपका बड़ा लड़का भर्ती पड़ा हैं । अगर आप एक-डेढ़ घंटे के अंदर उसको हम तक नहीं ले आते हैं,तो बात हमारे हाथ से निकल जायेगी।
एस.डी.एम.साहब ने सोचा महाप्रभु धमका रहे हैं। उन्होंने सिविल-सर्जन को फोन किया । सिविल सर्जन ने बतलाया,"आप जल्दी आ जाईये,आपका बड़ा लड़का हमारे हाथ से निकला ही जा रहा है।" तब एस.डी.एम. साहब ने कहा "आप उसको एंबुलेंस में लिटाकर , जितनी जल्दी हो सके , बाबा के पास यहां ले आइये।" उस लड़के को कालरा हो गया था और सौभाग्यवश लड़का समय के भीतर महाप्रभु के पास पहुंच गया। महाप्रभु ने उस लड़के को प़साद दिया ,और उसकी जान बच गई। इसके बाद एस.डी.एम.साहब महाप्रभु के अनुयायी बन गये।
यद्यपि एस.डी.एम.साहब ने बाबा का अनादर किया, फिर भी करूणासिंधु-बाबा ने उनके लड़के को अकाल-मृत्यु से बचा लिया।
किसी भक्त कवि ने ठीक ही लिखा है कि,"संत न छोड़े संतई,कोटिक मिलैं असंत ।"
पू. अघोरेश्वर
गुरुगीता पाठ
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शरीरमिन्द्रियप्राणा अर्थस्वजनबान्धवा ।
पितृमातृकुलं देवि गुरुरेव न संशय: ।।102।।
अर्थ
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हे देवि ! शरीर-इन्द्रिय, चक्षु, कर्ण, नासिका, जिव्हा, त्वक,वाक्,पाणि,नाद,पायु,उपस्थ,प्राण-अपान,समान,
उदान,व्यान,अर्थ, शब्द, स्पर्श, रूप, रस,गन्ध, आत्मीय, मित्रगण,और पितृमातृ कुल ये सभी गुरु हैं।
इस विषय में कोई संशय नहीं है ।।102।।
एक मात्र तत्व ब्रह्म ही जीव उद्धार करने के लिए गुरु रूप धारण कर अवतीर्ण होते हैं, ये सगुण निर्गुण दोनों हैं। वे ही चक्षु, कर्ण, आदि आध्यात्मिक इन्द्रियॉ हैं,वे ही प्राण उपलक्षित आधिदैविक सूर्य, चन्द्र, विद्युत आदि हैं, वे ही स्वजन बान्धव शब्द द्वारा उपलक्षित्
आधिभौतिक वस्तु समूह हैं। जो कुछ स्थूल पदार्थ नयन गोचर होता है, वह सब इस स्पन्दन की स्थूल अवस्था है। इसलिए सभी गुरु हैं।।102।।
102.
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Oh Devi, all the sence organs, motor and sensory eyes, ears, nose, tongue, skin, speech, hands, feet, rectum, penis, and the five pranas-Pran , Apan ,Saman, Udan and Vyan-tha five subtle elements-Shabad, touch, form, taste, smell, relations, friends
and the dynastties of father and mother
all are the Master and there is no doubt on
this subject.
COMMENTS:
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Brahm is the only Tatva and incarnates in
the form of the Master for the emancipation of Jeevas. With attributes and without attributes. He alone is eyes, ears, etc. the sensory sense organs. He only
is the Prana signified metaphysically in the
form of Sun. Moon and Electricity. He only
exists in the physical world as close relations. The visible gross substances are
nothing but the gross state of Brahm vibrations, Therefore, every thing is the Master and this has been ordained by Him.
👣🙏
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