न काया ही मेरी-379
न काया ही मेरी,
न माया ही मेरी
मिला जो है मुझको,
सभी कुछ है तेरा
कराये तू जो भी ,
नचाये तू जैसे
करम के हैं बन्धन,
न जाने कैसे-कैसे
ये कागज़ भी तेरा,
ये क़लम भी है तेरी
भाव भी हैं तेरे,
और रचना भी तेरी
मग़र मैं हूँ कि कुछ भी,
समझता नहीं हूँ
"मैं-मेरा"करता हूँ,
"तू"कहता नहीं हूँ
तू "मैं-मैं"मिटा दे,
यूँ ख़ुद में मिला ले
कि दीखे तू ही तू,
बस ख़ुदी से मिला दे !!
@शशिसंजय
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