गुरुगीता-94

  साधक को दो बातें हमेशा याद रखनी चाहिये-लक्ष्य को भूलना नहीं और अत्यन्त आतुरता होने पर भी कभी उबना नहीं है। देर सहन नहीं होती हैं परन्तु देर होने के डर से साध्यको छोड़ देना बहुत बड़ी भूल होती है।
          मुहम्मद साहब एक बार घूमते-फिरते जंगल में एक फकीर की झोंपड़ी पर जा पहुँचे। उस समय फकीर वहाँ नहीं थे, उनका एक शिष्य था। वहाँ एक चट्टान थी। उस चट्टान में तीन गहरे गड़े पड़े हुए थे। मुहम्मद साहब ने उस शिष्य से पूछा कि यहाँ चट्टान में तीन गट्टे कैसे पड़े हुए हैं ? उसने बताया कि यहाँ फकीर महात्मा रोज बन्दगी करते हैं-नमाज पढ़ते हैं तो उनके सिर के और घुटनों के टिकने से चट्टान में तीन गहरे गड्ढे बन गये हैं।
          इतने में आकाशवाणी हुई कि खुदा इसकी बन्दगी से खुश नहीं है। यह सुनकर मुहम्मद साहब रोने लगे, उन्हें बड़ा दुःख हुआ। इतने में वे फकीर (महात्मा) आ गये। महात्मा महात्मा थे और ये थे आचार्य (prophet)। आचार्य नाते महात्मा ने इनको प्रणाम किया और पूछा कि आप क्यों रो रहे हैं ? मुहम्मद साहब ने कहा कि यदि आपकी इस तरह की बन्दगी खुदा को मंजूर नहीं है, इससे अगर खुदा खुश नहीं है तो मेरी क्या हालत होगी ? मैं तो कुछ करता ही नहीं हूँ। मोहम्मद साहब की इस बात को सुनकर फकीर को बड़ी खुशी हुई और उन्होंने पूछा कि क्या आपने खुदा की वाणी सुनी है ? क्या सचमुच उन्होंने कह दिया कि हम खुश नहीं हैं ? मुहम्मद साहब बोले कि हाँ कह तो दिया तभी तो मुझे रंज हो गया। महात्मा बोले- बहुत अच्छा, खुदा को पता तो लग गया कि वह बन्दगी करता है। खुदा खुश हों या न हों। मुझे तो यह रगड़ लगानी है। खुदा चाहे न खुश हों उन्हें पता तो लग गया कि यह रगड़ लगा रहा है। बस, मेरा काम बन गया। इतने में ही दूसरी आकाशवाणी हुई कि हे फकीर ! हम तेरी बन्दगी पर खुश हैं। इतनी ही देर में क्यों खुश हो गये ? इसलिये कि उन्होंने देखा कि इसमें इतना धैर्य है, इसके मन में इतना विश्वास है कि खुदा या भगवान् चाहे बहुत दिनों के बाद मिले या न मिलें उनकी इच्छा है। परंतु मैं भगवान् की सेवा करने से, भक्ति करने से कभी चूकें नहीं। बस मेरा काम हो गया।
           भगवान् ने गीता (६। २५) में कहा है-

    शनैः    शनैरु    परमेद्     बुद्ध्या    धृतिगृहीतया।
    आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत्॥

          अर्थात् धीरे-धीरे अभ्यास करता हुआ उपरति को प्राप्त हो तथा धैर्ययुक्त बुद्धि के द्वारा मन को आत्मा में लगाओ। दूसरे किसी भी चीज का चिन्तन मत करो। यदि बीच में ही ऊब गये, यदि रास्ते में ही विचलित होकर हट गये तो ठीक नहीं होगा। इसलिये साधक को धैर्यवान् और विश्वासी होना चाहिये। साधक केवल चलना जानता है। वह पल-पल में पूछता नहीं कि अभी कितनी दूर है। वह दूरी से घबड़ाता नहीं है।

प्रियतमसे  मिलनेको जिसके  प्राण कर रहे हाहाकार।
गिना नहीं उसने पथकी दूरीको, भयको किसी प्रकार॥
                            - श्रीहनुमानप्रसादजी पोद्दार
                                                        
गुरुगीता पाठ
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गुरुदेवो गुरुधर्मोगुरोर्निष्ठा परं तप: ।
गूरो: परतरं नास्ति नास्ति तत्वं गुरो: परम् ।।100।।

अर्थ
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गुरुदेव ज्योर्तिमय हैं, गुरु ही श्रेष्ठ धर्म हैं, और गुरु भक्ति श्रेष्ठ तपस्या है । गुरु से श्रेष्ठ तर कुछ भी नहीं है और गुरु की अपेक्षा परम् तत्व भी नहीं है ।।100।।

100.
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Tha Master is the effulgent one, tha Master itself is the par excellent religion.
The Master's devotion is the ascetic practice par excellence and there is nothing beyond Guru tatva not even the Tatva-par excellence.
                                 👣🙏

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