गुरुगीता-92
एक लकड़हारा जो कि जंगल से लकड़ी काट कर अपना जीवन-यापन किया करता था उसने अपने गुरु की सेवा करके एक आकर्षण मंत्र सिद्ध कर लिया था ,जिसके द्वारा वो किसी भी वस्तु को मंत्र का प्रयोग करके अपनी तरफ खींच लेता था | एक दिन वो जंगल में जा कर किसी पेड़ के ऊपर चढ़ कर लकड़ियाँ काट रहा था और उसके पास से उस क्षेत्र के महाराज अपनी सेना के साथ जा रहे थे | महाराज ने जब उसको देखा तो डर के मारे लकड़हारे के हाथ से टांगी ( लकड़ी काटने का औजार ) छूट कर नीचे जा गिरी | ऐसा दृश्य देख कर महाराज हँसने लगे और आगे चल दिए | थोड़ी देर के बाद फिर से लकड़ी काटने की आवाज आने लगी तो महाराज ने देखा कि इतना जल्दी लकड़हारा नीचे से आकर टांगी उठाकर कैसे पेड पे चढ़ गया | वो फिर से लकड़हारे को देखने लगे और डर के मारे लकड़हारे से फिर टांगी छूट कर नीचे गिर गयी | महाराज फिर मुस्कराये और आगे चल दिए | लेकिन फिर वही आवाज लकड़ी काटने की चालू हो गयी तो महाराज के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा और इस बार सेना के साथ रुक गए और लकड़हारे को नीचे आने का आदेश दिया।
लकड़हारे से उन्होंने पूछा कि तुम इतनी जल्दी अपने लकड़ी काटने के औजार को नीचे उतर कर ऊपर कैसे ले के चले जाते हो ये तो असंभव है | तब लकड़ हारे ने कहा कि राजन मुझे मेरे गुरुदेव ने आकर्षण मंत्र दिया है जो मंत्र मुझे सिद्ध है और मैं मंत्र के द्वारा तुरंत ही उसे ऊपर ले लेता हूँ चंद सेकंड में | तब राजन ने कहा कि मुझे भी ये विद्या सिखा दो | लकड़हारे ने कहा कि राजन बिना गुरु में श्रद्धा और विश्वाश पैदा हुए ये असंभव है और आपको मुझमें विश्वाश ही नहीं होगा | राजा ने कहा कि नहीं आप मुझे अभी बताओ, मैं आपको सच्ची श्रद्धा और विश्वाश के साथ गुरु अपनाता हूँ | लकड़हारा डर के मारे मंत्र सिद्धि से सम्बंधित विधि - बिधान राजा को बता दिया |
घर वापस आ कर लकड़हारे ने सारा वृतांत पत्नी को सुना दिया | लकड़हारे ने पत्नी से कहा कि अब हमारा यहाँ रहना ठीक नहीं क्योंकि राजा को मुझ लकड़हारे में गुरु का भाव पैदा ही नहीं होगा, विश्वाश पैदा ही नहीं होगा तब मंत्र सिद्ध ही नहीं होगा और मंत्र सिद्ध नहीं होने पर वो वापस आ कर हम दोनों को मौत के घाट उतार देगा | इसी उधेड़बुन में वो दोनों अपना सामान ले कर २-३ दिन बाद घर से निकल कर जंगल के रास्ते जाने लगे | कुछ दूर जाने के बाद राजा के मंत्री अपने साथ आये सैनिको को लेकर लकड़हारे को रोक कर पूछा आप कहाँ जा रहे हैं | आप यहीं रुकिए ? महाराज आप को खोजते हुए यहीं आ रहे हैं | इतना सुन कर लकड़हारे के तो पसीने छूटने लगे और भय के मारे कुछ शब्द ही नहीं निकल रहे थे कि अब तो राजा का मंत्र सिद्ध हुआ ही नहीं होगा और वो कौन सी सजा मुझे देगा पता नहीं | वो मन ही मन अपने गुरु को याद करने लगा |
जब महाराज उसके सामने पहुंचे तो कई तरह के मिष्ठान्न,सोने - चांदी के बर्तन,कपड़े,भोजन इत्यादि ले कर उसके सामने रखवा दिए और सास्टांग प्रणाम कर के बोले कि गुरुदेव आप ने जैसे कहा था मैंने उसी विधि-विधान से आपके द्वारा दिए हुए आकर्षण मन्त्र का साधना किया और सिद्धि को प्राप्त हुआ | लकड़हारे को तो समझ में नहीं आ रहा था कि वो क्या बोले | राजा ने फिर उसे अपने राज्य में सम्पूर्ण ऐश्वर्य युक्त जीवन प्रदान किया |
!!! बिनु विश्वाश न कौनो सिद्धि !!!!
गुरुगीता पाठ
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शुचिरेव सदा ज्ञानी गुरुगीता जपेन तु ।
तस्य दर्शनमात्रेण पुनर्जन्म न विद्यते ।।98।।
अर्थ
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और ज्ञानी गुरुगीता पाठ द्वारा सर्वदा पवित्र होते हैं, उनके दर्शन मात्र से ही पुनर्जन्म नहीं होता ।।98।।
98.
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The realised ones always keep themselves purified by reciting Guru Geeta and by their mere
sight one is relieved of the Cycle of birth and death.
👣🙏
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