सलाखों के अन्दर गायत्री साधना-54
एक और वाकया याद आता है सुन्दर सिंह (परिवर्तित नाम) की सज़ा का। लगभग दस साल बाद पत्नी ने आत्महत्या कर ली, दो
बच्चे तकरीबन आठ और नौ साल के। ससुराल बहुत अमीर तथा
पहुँच वाला । अमीरी में कम तो ये लोग भी नहीं थे लेकिन पूरे परिवार के कारागार में अन्दर आ जाने से मानसिक तनाव बहुत ज्यादा हो गया था। बच्चे अपनी बूआ के यहाँ रह रहे थे। मॉ-बाप
एवं ख़ुद अन्दर थे। ऐसे में रिश्तेदार भी साथ छोड़ देते हैं। बहन और बहनोई कोर्ट-कचहरी में भाग-दौड़ कर रहे थे। जब भी कोई
नया बन्दी इस तरह परेशान होता तो पुराने बन्दी भाई उन्हें जबरन
गायत्री मंदिर लाते, सुबह शाम आरती व ध्यान में शामिल करते तथा रविवार को हम लोगों के पहुँचने पर यज्ञ में में बिठाकर बाद में मिलवाते। जब इस परिवार से मिले तो पता चला कि सास-बहू
में कम पटती थी और उस दिन सास ने पीहर के किसी कार्यक्रम में जाने के लिए मना कर दिया था इससे गुस्सा होकर बहू ने अपने आपको आग के हवाले कर दिया। उसका कमरा ऊपर की मंजिल पर था। जब तक घर वालों को पता लगे तब तक तो वह 95% तक जल चुकी थी । ससुराल वालों ने दहेज मर्डर केस में कारागृह
पहुँचा दिया। जो भी हो होनी को कौन टाल सकता है शायद तकदीर में यह लिखा था ।
भाग-दौड़ के साथ-साथ उन्हें गायत्री मन्त्र का जप और मंत्र लेखन करने के लिये कहा तथा इस विश्वास के साथ कि
गुरुदेव अवश्य ही इनकी सहायता करेंगे उन्हें हिम्मत बंधाई। धीरे-धीरे पूरा परिवार गायत्री मंत्र जप करने लगा। सुन्दर सिंह जप के साथ मंत्र लेखन भी अधिक से अधिक करने लगा।हर रविवार
यज्ञ में भी पूरा परिवार शामिल होता, उसकी पत्नी की आत्मा की
शॉति और सदगति के लिये भी आहुतियां सभी लोग देते। धीरे-धीरे पूरे परिवार की हिम्मत लौटने लगी विश्वास बढ़ने लगा।
एक दिन उसके पिताजी बोले दीदी मेरे बेटे को तो शायद अभी और रहना पड़े लेकिन मैं और मेरी पत्नी तो यहाँ से जल्दी ही निकल जायेंगे। मैंने पूछा कि कैसे ? तो झट से बोले कि कल रात
जब जप कर रहा था तब ऐसा आभास हुआ और सचमुच उनकी पत्नी और वे लगभग 7-8 महीने में बाहर आ गए किन्तु उनका बेटा सुन्दर सिंह कारागार में ही रहा। जब-जब उसकी जमानत की
कोशिश की जाती, तब-तब उसकी ससुराल वाले कोर्ट में न जाने
क्या कर देते कि उसकी जमानत अर्जी ख़ारिज हो जाती। एक दिन उसने बहुत ही दुःखी होकर बताया कि उसका साला विदेश में
रहता है और वहां से रुपये भेजता है, कोर्ट-कचहरी में पैसा खिलाकर मुझे बाहर नहीं निकलने देना चाहता। हम भी क्या कर
सकते थे केवल जप बढ़ाने के अलावा। उसको दिलासा देते रहे काफ़ी देर तक। इतने में वो बोला कि आप मेरे घर जाकर मेरे बच्चों से मिलकर आओगे, तो मुझे शान्ति मिलेगी। बहुत ही ज़िद
करने लगा तो हमने हॉ कह दी। उसी दिन हम लोग उसके घर पहुँचे। मॉ-बाप तो जानते ही थे, बहुत ख़ुश हुये मिलकर। बच्चों से
मिलवाया उन्होंने। इतने प्यारे बच्चे कि देखकर मन बहुत दुःखी हुआ कि ऐसे मासूम बच्चों को छोड़कर कोई मॉ कैसे अपने प्राणों की आहुति देने के लिए तैयार हो सकती है, लेकिन यह सब तो हो
ही चुका था। न जाने क्या बीती होगी उस पर।
इधर सुन्दर घर वालों के लिए परेशान भी रहता और जप, लेखन
और यज्ञ में भी बराबर शामिल रहता। धीरे-धीरे उसकी आस्था
ज्यों-ज्यों बढ़ती गई, गुरुदेव माताजी की कृपा सतत् उसे मिलती
रही। उसको भी विश्वास हो गया था कि जब तक मेरा प्रारब्ध पूरा
नहीं हो जाता तब तक मैं बाहर नहीं जा सकता, इससे अच्छा है कि अपने मन को साधना में ही लगाये रखा जाए। ख़ूब उत्साह के साथ मन्दिर पर कार्य करना, सबको हर तरह से सहयोग करना, उसके स्वभाव में शामिल हो चुका था। गुरुदेव ने समय आने पर
आजीवन कारावास की सजा को लगभग 7- 8 साल की सज़ा में
बदलकर उसे बरी करा दिया। अभी वह कहॉ है नहीं मालूम, लेकिन जहाँ पर भी होगा गुरुदेव की शरण में ही होगा, ऐसा विश्वास है ।
👣🙏
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