क्या-क्या-381

क्या-क्या रूप  धरे हैं तुमने
मैं तो कुछ भी जानू ना
कितने भेष बदलकर मिलते
मैं तो कुछ भी समझूँ ना
सतगुरु-मेरे दाता-मेरे
प्यार तुम्हीं को करता हूँ
कितने भी तुम भेष बदल लो
मैं तुम पर ही मरता हूँ
रिश्ते-नाते, झूठे-झगड़े
सब कुछ अब तो छूट चुके हैं
दिल से जितने जुड़े थे नाते
वो भी अब तो दूर हटे हैं
केवल तुम्हारा ऑचल मैंने
कसकर अब भी पकड़ा है
मुश्किल से मैं छूट सका हूँ
जिन नातों ने मुझको जकड़ा है !!
                      @शशिसंजय

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