उम्र का पहिया--382
उम्र का पहिया बढ़ते ही
पीछे की यादें आतीं हैं
वो उछल कूद औ पेड़ पै झूले
सब घुमड़-घुमड़ कर जाती हैं
क्या निश्छल प्यारा बचपन था
कभी रोता था कभी हँसता था
ज़िद करने पर घर का हर बन्दा
बेहद ही लाड़-लड़ाता था
पल में रूठो पल में अब्बा
हर पल का बचपन अच्छा था
छल झूठ कपट की ख़बर नहीं
नख से सिर तक वो सच्चा था
कोई लौटा दो बचपन मेरा
जो हर पल की याद दिलाता है
जिम्मेदारी का कुछ भान नहीं
ख़ुद की मस्ती में ही रहना था!!
@शशिसंजय
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