दिले शायरी -74
---भूल जाता हूँ अक्सर कि तुम साथ रहते हो मेरे,
दुनिया की दगाबाज़ी फ़िर क्यों सताती है मुझको !!
---दोहरे मुखौटे लेकर जो चल रहे थे अब तक,
तुमने नक़ाब उनका झट से उखाड़ फेंका !!
---जिस पर तेरी मेहर हो वो टूटे भी भला कैसे,
तुम ही तो उसे फ़िर से फ़ौलाद बना देते हो !!
---तेरे दर की धूल को माथे पै लगाता आया हूँ,
पीछे से उड़ती धूल को पीछे ही छोड़ आया हूँ !!
---तेरे ही रहमोकरम पर ज़िन्दा हूँ मौला आज तक,
लोगों ने तो घबराकर दफ़न कर दिया था मुझको !!
---बिगड़ी बनाते आये हो, दर पै आने वालों की,
ये हुनर इंसान में हो भी नहीं सकता!!
@शशिसंजय
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