गुरुगीता-93

एक बार की बात है | बाबा सावन सिंह जी अपनी कार में जा रहे थे | तो कार के बाहर उनकी नज़र पड़ी एक कार पंचर हो गई थी ।और उस कार का परिवार लोगों से मदद मांग रहा था | बाबा सावन सिंह जी ने अपनी कार को रोकने के लिए कहा | जैसे ही बाबा जी  कार के बाहर आये तो उस परिवार के एक सदस्य ने बाकी लोगों को कहा कि देखो कितना सुन्दर सरदार है | तो उनके पास बाबा जी आये और उनकी मदद करवा दी | अब जाने का वक़्त हो गया था तो उस परिवार में से एक सदस्य ने पूछा कि सरदार जी आप कहां रहते हो और क्या काम करते हो | तो बाबा जी ने कहा कि मैं ब्यास मैं एक छोटा सा सेवादार हूँ | मेरा नाम सावन सिंह है | इतना कहने के बाद परिवार वालों ने कहा कि कभी मौका मिला तो जरूर आएंगे |
तो बाबा जी ने कहा कि आपका स्वागत है जब भी आओगे मेरा नाम ले लेना | इतना कह कर बाबा जी चले गए |
एक साल बाद वो परिवार वाले अमृतसर घूमने के लिए जा रहे थे | तो उन्हों ने सोचा कि ब्यास रास्ते में पड़ता है तो उन बाबा जी से भी मिल लेते है | वो शाम को ब्यास पहुँच गए और उन्होंने बाहर खड़े सेवादार को कहा कि हमें ” सेवादार सावन सिंह “ जी से मिलना है | तो वहां पर 4 सावन सिंह जी सेवादार थे तो उन्हों ने कहा कि नहीं इनमे से कोई भी नहीं है |
फिर एक सेवादार ने कहा के जिसे आप मिलना चाहते हो क्या पता  ? आज वो सेवा पर आये ही न हों |
        तो परिवार वाले थोड़ा सा मायूस हो गए और आगे अमृतसर जाने की सोच रहे थे | फिर एक परिवार के सदस्य ने कहा के आऐ तो हैं ही इतनी दूर...क्यों न कल का सत्संग ही सुन लेते हैं | जैसे अगले दिन बाबा सावन सिंह जी सत्संग करने के लिए गद्दी पर आये | वो परिवार के सदस्य देख के हैरान रह गए यह तो यहाँ के महाराजा है और हमें बोल रहे थे कि में एक छोटा सा सेवादार हूँ |
फिर सत्संग खत्म होने के बाद वो बाबा जी से मिलने गए ज्यादा भीड़ होने की वजह से वो मिल नहीं पाये | तो उन्हें वो बात याद आई कि बाबा जी ने कहा था कि जब मुझे मिलना हो तो मेरा नाम ले लेना | उन्हों ने सेवादार को कहा कि हमें बाबा जी से मिलना है सेवादार ने अन्दर जाकर बाबा जी से कहा कि उनको अंदर बुलाओ | जैसे ही वो अंदर आये तो उन्हों ने बाबा जी को कहा कि बाबा आप तो कह रहे थे के आप एक छोटे से सेवादार हो पर आप तो यहाँ के गुरु जी हो | तो बाबा जी ने उन्हें कहा कि गुरु हमेशा अपनी संगत के लिए सेवादार होता है |
उसके बाद उस परिवार ने बाबा जी से नाम दान भी ले लिया | तभी तो कहते है कि संतो का अपने प्यारों को अपनी तरफ खींचने का अलग ही अंदाज़ होता है |

गुरुगीता पाठ
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सत्यं सत्यं पुन: सत्यं निजधर्मोsमयोदित: ।
गुरुगीता समोsनास्ति सत्यं सत्यं वरानने ।।99।।

अर्थ
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सत्य सत्य पुन: सत्य कहता हूँ कि मैंने अपना धर्म स्वयं कहा। हे
सुवदने गुरुगीता के समान सचमुच कुछ भी नहीं है ।।99।।

99.
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I re-affirm truthfully again and again that I have
related my own religion.  Oh , beautiful faced , there is nothing that can be compared to Guru Geeta.

                                                           👣🙏

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