सलाखों के अन्दर गायत्री साधना-53


हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता, कहहिं सुनहिं सब विधि सब सन्ता" तुलसीदास जी महाराज ने सच ही कहा है। प्रभु की गाथा कहने के सबके अपने-अपने तरीके हैं । प्रभु की छाया जिसको जिसमें दिख जाये वही उसका प्रभु स्वरूप है।
एक दिन हम लोग मिठाई खरीदकर दुकान से उतरकर गाड़ी में
बैठने को हुये ही थे कि किसी ने पीछे से आवाज़ लगाई, दीदी जी....भाई साहब .....रुको तो। पीछे मुड़कर देखा तो एक
प्रौढ़ व्यक्ति और उनका लगभग 35 साल का बेटा । दौड़कर आये और प्रणाम करने लगे । हम दोनों एक-दूसरे की शक़्ल देखने लगे क्यों कि हम उन्हें नहीं पहचान पा रहे थे। वे शायद समझ चुके थे कि हमने उन्हें पहचाना नहीं है, अतः ख़ुद ही अपना परिचय देते हुए बोले कि मैं रामसरूप (रामस्वरूप) और ये मेरा बेटा प्रहलाद । आपने हम सबको नई जिंदगी दिलाई गुरुजी-माताजी से । फ़िर सारा वाक़या याद दिलाया, भावुक होकर लिपटकर रोने लगे । बार-बार कहते रहे हमने आपको ख़ूब ढूँढने की कोशिश करी पर आपका पता किसी ने भी नहीं दिया। आज इतने सालों बाद आपके दर्शन हुए , हम बाप-बेटे धन्य हो गये, गुरुदेव माताजी ने हमारी प्रार्थना सुन ली।
              दरअसल यह पूरा परिवार ही दहेज मर्डर केस में कारागृह पहुँच गया था। इनकी पत्नी भी महिला कारागृह में थीं ।
जब अचानक कोई भी व्यक्ति कारागृह में अन्दर पहुँचता है तो शुरू में वह मानसिक रूप से अत्यधिक तनाव में रहता है । वही
हालत इन सभी की भी थी । दिन-रात रोते रहना, गुमसुम रहना,
इसी तरह दिन गुज़र रहे थे । तभी अन्य बन्दी भाइयों ने इनको गायत्री मन्दिर आने की सलाह दी लेकिन ये लोग नहीं आये। जब
सभी ने पूरी बात हमें बताई तो हम लोग बैरक में मिलने गये। बहुत
समझाया तथा अगले रविवार को मन्दिर आने का कहकर हम घर
आ गये । अगले रविवार को जब हम यज्ञ कराने पहुँचे तो इन दोनों पिता-पुत्र् को यज्ञ में शामिल होते देख हमें बहुत ही ख़ुशी हुई , यज्ञ  के बाद भी दोनों  बार-बार एक ही बात कहते रहे कि हमने हत्या नहीं की है। परिवार में कई बार कहा-सुनी हो जाने पर बच्चियॉ गुस्से में आत्महत्या कर लेतीं हैं, लेकिन उसका ख़ामियाजा पूरे परिवार को भुगतना पड़ता है, शायद इनके साथ भी ऐसा ही हुआ
हो क्यों कि माता-पिता बेटे के साथ भी नहीं रहते थे।
                लगातार यज्ञ में शामिल होने और गायत्री मंत्र का जप करने से इन लोगों के मन में शान्ति आई  तथा अब इनको मन्दिर आना अच्छा लगने लगा । इधर प्रह्लाद की पत्नी कुछ दिनों बाद ही उसे स्वप्न में दिखाई देने लगी । आये दिन मृत पत्नी के स्वप्न में
आने से वह बहुत घबरा गया, पूरी रात जागकर गायत्री मंत्र जपता
रहता । सो नहीं पाने के कारण वह बहुत अधिक बीमार हो गया ।
जब उसके पिता ने यह बात बताई तो हम सभी उसे कारागृह के
अस्पताल में मिलने गये और उसे आश्वासन दिया कि तुम गायत्री मंत्र जप कर रहे हो, गुरुदेव अच्छा ही करेंगे । यज्ञ की विभूति उसके मस्तिष्क पर लगाई और थोड़ा खिलाई भी ।
                       कुछ दिनों बाद जब वह ठीक हो गया और यज्ञ में
शामिल होने लगा तो रामसरूप और प्रह्लाद के साथ सभी बन्दी भाई भी गुरुदेव की प्रेरणा से उसकी पत्नी की आत्मा की शांति और सदगति के लिए गायत्री मंत्र के साथ ही एक माला महामृत्युंजय मंत्र की आहुति कई महीनों तक लगातार देते रहे ।
धीरे-धीरे प्रह्लाद की पत्नी का स्वप्न में आना बन्द हो गया । लगभग नौ साल की सज़ा काट कर ये लोग जब बाहर आये तो
समाज ने इन्हें आसानी से स्वीकार नहीं किया, धीरे-धीरे इन दोनों ने अपना शहर छोड़कर दूसरी जगह सब्जियां बेचना शुरू किया ।
आज थोक सब्जी विक्रेता के तौर पर पिता-पुत्र मिलकर काम कर रहे हैं, प्रह्लाद की शादी हो चुकी है तथा भरा-पूरा परिवार ख़ुशी से
जीवन-यापन कर रहा है, उनके व्यवसाय की तरह गायत्री मंत्र भी
उनके जीवन का अभिन्न अंग बन चुका है, गुरुदेव माताजी की कृपा सतत् उन्हें मिल रही है ।
                                 क्रमशः!!
                          'गुरुकॄपा केवलम्'
                      'गुरुवर शरणम् गच्छामि'
                                 👣🙏

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