सलाखों के अन्दर गायत्री साधना-55
एक और जुझारू बन्दी भाई का याद आता है नवरंग सिंह। लूट एवं मारने का प्रयास (Attempted to murder) में दस साल की सज़ा में था। पैरोल पर गया और वहीं से भाग गया,बाद में पकड़ा गया तथा दुबारा में सात साल की सज़ा। थोड़ा दादागिरी का स्वभाव, आपस में तू-तू मैं-मैं छोटी-छोटी बातों पर कर जाना, कुछ आदतन सा हो गया था। गायत्री मन्दिर के सामने वाली बैरक में रहने के कारण मन्दिर की गतिविधियों को देखता रहता। धीरे-धीरे मन्दिर पर आने लगा। आये दिन झगड़ने की शिकायतें आती रहतीं। जब और बन्दी भाई उसकी बातें बताते तो सुनकर हँसी भी आती और गुस्सा भी आता। लेकिन उसे प्यार से समझाना ही इलाज था क्योंकि बात-बात पर गुस्से में आ जाना तथा हमसे भी रूठ जाना,उसकी
आदत में शुमार था। लेकिन मन्दिर के कार्यों को पूरी निष्ठा से पूर्ण करना तथा बाक़ी लोगों से भी मन्दिर की साफ़-सफ़ाई करा लेना,सबकी अलग-अलग काम की
ड्यूटी लगाकर रखना, यह सब उसे बख़ूबी आता था।
कुल मिलाकर उसका मैनेजमेंट बहुत लाजवाब था। इसीलिए बहुत सी गलतियों को अनदेखा कर देना तथा अन्य बंदियों को भी यह समझाना कि तुम्हारा भाई है, कितना ख़याल रखता है तुम सभी का। छोटी-छोटी बातों पर उसकी शिकायत करने की वजाय उसे सहयोग किया करें। दिन ब दिन उसके स्वभाव में परिवर्तन आने लगा। एक दिन जब हम यज्ञ कराने पहुँचे तो नवरंग बहुत ही उदास था पूछने पर पता चला कि उसकी पत्नी की हालत ख़राब है, पैरोल (छुट्टी) नहीं मिल पा रही है, हमसे घर जाकर सहायता के लिए
कहने लगा, उसके घर जाकर देखा तो सचमुच उसकी पत्नी की तबियत खराब थी, कपड़े सिलकर गुजारा करती थी। लेकिन बीमारी हालत में काम कैसे करे, तीन छोटे बच्चे भी थे। जितना संभव हुआ सहायता की, ताकि भावनात्मक संबल मिल सके। जिस औरत का पति कारागार में हो, उस परिवार के रिश्तेदार सबसे पहले दूर के संबंध बना लेते हैं। ऐसा ही इस परिवार के साथ था। पिता के पास न होने के कारण बड़ा बेटा मॉ का कहना नहीं मानता था,अतः उसके आग्रह पर कुछ-कुछ दिनों में परिवार को संभालने हम लोग जाने लगे। इधर नवरंग अधिक से अधिक बन्दियों को गायत्री मंत्र एवं गायत्री मंत्र लेखन से जोड़ने लगा। नवरात्रि साधना में भी अधिक से अधिक लोग आने लगे। गुरुदेव के आगे जो भी ज़िद करता अक्सर पूरी हो जाया करती। एक बार 2005 की गायत्री जयन्ती के पहले रविवार को अचानक से बोला- भाईसाहब इस बार गायत्री जयन्ती पर 100 किलो लड्डू का प्रसाद बॉटना है, वह तो कह दिया लेकिन हम लोग प्रार्थना में जुट जाते कि गुरुदेव कैसे भी हो इतनी व्यवस्था करा दें।और सचमुच गायत्री जयन्ती पर उतना ही प्रसाद पूरी जेल में बॉटा गया जितना उसकी इच्छा थी। अच्छे खाने काशौकीन। जब भी हम रविवार को प्रसाद लेकर पहुँचते तो मन चाहा प्रसाद देखकर ख़ुश हो जाता और झट से कह उठता कि मैंने गुरूजी से आज यही खाने की इच्छा जताई थी। एक बार बोला-जीजी घर पर होता तो मिर्ची के टिपोरे (हरी मिर्च की सब्जी) और घी लगी रोटी बड़े चाव से खाता। अगले रविवार हम लोग रोटी और टिपोरे बनाकर लेकर गये उसी का भोग लगा तथा सबको वही प्रसादी बॉटी गई,बच्चों जैसा ख़ुश हो गया। बहुत सी यादें आज भी ज़ेहन में ताजा हैं नवरंग की। गुरुदेव माताजी की कृपा सतत् उसे मिलती रहे, बस यही प्रार्थना है।
'गुरुकॄपा केवलम्'
"गुरुवर शरणम् गच्छामि"
👣🙏
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