जैसे भी(आध्यात्मिक)-30

जैसे भी मैं रहता हूँ

अपनी दुनिया में जीता हूँ

ख़िदमत उसकी ही करता हूँ

और उसी के ख़्वाब में रहता हूँ

दुनिया रूठे या छूटे मुझसे

परवाह नहीं मैं करता हूँ

हो यारे ख़ुदा जिसका अपना

मैं उसी सहारे जीता हूँ

कोई काम मेरे आयेगा क्या...?

उम्मीद ख़ुदा से करता हूँ

जब चाहेगा वो भेजेगा

कोई देवदूत मुझको अपना

बस वही सहारा देगा मुझे

जो है मेरा सच्चा अपना

              👣🙏🏻

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