सुबह-सुबह(पारिवारिक)-35
अलभोर-सुबह
वो आकर जब रोज़
जगाती है मुझको
तो ग़ुस्सा आता है
बिना नागा किये चली आती है
कभी तो ना आने की
ना जगाने की सोच...?
लेकिन वह है कि
मानती ही नहीं
झुँझलाकर जब भी कभी
ग़ुस्से से बाहर आती हूँ
डाँटने उसको
तो फुर्र से उड़ जाती है
मेरी प्यारी गौरैया
शायद......
पिछले जन्म में मेरी....
कुछ रही होगी
मेरी नज़दीकी
चिड़िया रानी
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें