तृष्णा(आध्यात्मिक)-27

तृष्णा का भंडार
खाली ही नहीं होता
चाहता तो बहुत हूँ
कि-----
कैसे भी बुझ जाये ये प्यास
न जाने जन्म-जन्मान्तरों से
आ रही है मेरे साथ
तभी तो कितना भी प्रयास करूँ
इस आग को बुझाने का
किन्तु वो बढ़ती ही
चली जाती है
तृष्णा की आग----
इच्छाओं का बढ़ते जाना
कामनाओं की पूर्ति की चाह
हर चीज़ को पाने की लालसा
क्या यही है---तृष्णा ?
जिसने कितनों को बरबाद करके छोड़ा है
तृष्णा केवल तुम्हें पाने की
तृष्णा केवल तुझमें शरणागत होने की
तृष्णा हर जन्म तेरे साथ बिताने की
तुम ही पूरी कर सकते हो
मेरे गुरुदेव-----मेरे दाता
                     👣🙏

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