सोचता हू(आध्यात्मिक)-32

सोचता हूँ

न जाने लगातार कब से

ये ज़िन्दगी...?

न जाने किन-किन रूपों में

जन्म-जन्मान्तरों से 

चलती चली जा रही है

और हम सभी चलते चले जा रहे हैं

उसी के पीछे-उसी के अधीन

पिछला पता नहीं लेकिन...!

इस जीवन की सार्थकता क्या है ?

लक्ष्य क्या है...?

सब कुछ सँसारी व परिवारी जनों 

के लिये करना व जीना

या फिर अपने उद्धार की

कोशिश करना

ईश्वर पर विश्वास और

ईश्वर के सानिध्य के लिये जीना

क्यों कि.....

सब यहीं छूट जाना है

साथ तो केवल

उसी को जाना है 

मेरे ईश्वर......मेरे गुरु....मेरे प्रीतम

               👣🙏🏻

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