जब छाने लगा(आध्यात्मिक)-320
जब छाने लगा अंधेरा था,
जब अपनों ने ही घेरा था।
तब तुमने आकर ही दाता,
मझधार से मुझे निकाला था।
-कैसे कहूँ गुरुवर तुम्हारे,
प्रेम की गाथा भला।
चोट पर भी चोट खाई जब कभी,
पीठ आकर थपथपाई तब भला।
-प्रेम के अवतार गुरुवर आप तो,
प्यार का सागर भला हैं आप तो।
"नासमझ" मैं ही रही हूँ आज तक "ना"समझ पाई भला इस प्यार को।
-पांव लड़खड़ाने लगे जब भी कभी,
तब ही आकर तुमने मुझको थाम लिया।
डगमगाये थे हालात मेरे जब कभी,
दे सहारा हाथ आगे कर दिया।
-गुरुवर दाता प्रीतम मेरे आप ही,
जोश भरते हैं हमेशा आप ही।
जब तलक काया रहे ये साथ में,
तब तलक देना पड़ेगा साथ भी।
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12/12/17
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