प्रीतम ध्यान(आध्यात्मिक)-321
प्रीतम ध्यान तुम्हारा करते,
तुम्हें सामने पाते हैं।
अधरों पर मुस्कान लिए तुम,
हमको खूब लुभाते हो।
सिर से नख तक देखा करती,
छवि तुम्हारी प्यारी सी।
मैं मूरख हरदम ही रहती,
संग तुम्हारे प्यासी सी।
मंद-मंद मुस्काते रहते,
लगता जैसे देख रहे हो।
....... कभी - कभी यह भ्रम हो जाता,
.......... तुम ही मेरे पास खड़े हो।
कैसे बताऊँ तुम ही हो बस,
मेरी रग-रग में मौजूद।
आसपास की हवायें भी रहतीं,
तेरी खुशबू से महफूज़।
तेरी खुशबू , तेरा आना,
मन को बहुत सुहाता है।
पल में आना, पल में जाना,
मुझको खूब ही भाता है।
शायद मेरे जैसा कोई,
भक्त पड़ा हो कहीं बेहाल।
आंख-मिचौली खेला करते,
इसीलिए तुम नन्द के लाल।
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