साल पुराना जा रहा(आध्यात्मिक)-327

"साल पुराना जा रहा, नया आगमन होय।
          बीती ताहि बिसारि के,आगे की सुधि लेय"

बीता भूल नहीं पाते ,
       तुमने सदबुध्दि का मंत्र दिया।
बातें समझ नहीं पड़तीं,
        दुर्बुध्दि ने हमको घेर लिया ।

मेरे गुरूवर प्यारे दाता ,
       अपराध मेरे मुआफ़ करना ।
जाने अनजाने जो ख़ता हुईं ,
         भूलें-चूकें बिसरा देना ।

तुम पावन हो, मैं पतिता हूँ ,
       पतिता को पावन कर देना ।
अपने चरणों में जगह बना ,
         मुझको भी वहीं रहने देना ।

तेरे दर की जो धूल मिले ,
        मैं मल-मल उसको लगाउँगी ।
गंगा जाकर मैं करूँगी क्या ,
         तेरे प्रेम के झरने में नहाऊँगी ।

तेरे प्यार के झरने के नीचे,
         मैं डूबी रहती हूँ ख़यालों में ।
कुछ बातें मुझको याद रहीं ,
        कुछ आती रहतीं हैं ख़्वाबों में।

सालों दर साल गुज़र जाते ,
         मैं अपनी ही धुन में रहती हूँ ।
तेरी यादों और वादों के मैं ,
         दिन भर सीप चुना करती हूँ ।
               ......तेरी गली घूमा करती हूँ,
                 .......मैं तुझको ढूँढा करती हूँ ।

                                   👣🙏🏻
                                       31/12/17

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