अमृतवाणी-173-174-175
आत्मावलोकन का सरल उपाय-एकान्तवास(भाग-7)
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हमारा उदाहरण है आपके सामने। फिजूलखर्ची हमने कानी कौड़ी की भी नहीं की है। जो भी हमारे पास था, उसको बेहतरीन कामों में लगा दिया है, जिसका परिणाम आपने देखा न! देखा होगा। हमारे गाँव में स्कूल बना हुआ है, गायत्री तपोभूमि बनी हुई है, आप देख लीजिए। हमारे पास जमीदारियों के बॉण्ड आए थे; सब खत्म हो गए, सब लगा दिए। आप ऐसा नहीं कर सकते? पैसे को फिजूलखर्चियों में लगाएँगे, औलाद के लिए जमा करेंगे—आप ऐसी योजना नहीं बना सकते। आप यहाँ से जाने के बाद में जो साधन हैं, उन्हीं को बढ़ाते रहेंगे—ऐसा ही सोचते रहेंगे। बढ़ाने की बात मत सोचिए। पहली बात वहाँ से सोचिए कि हम ठीक तरह इनका कैसे इस्तेमाल कर पाएँ। जब ठीक तरीके से इस्तेमाल करेंगे, तब आप यकीन रखिए भगवान आपको दो हाथ से नहीं, चार हाथ से देगा।
भगवान के चार हाथ भी हैं, इनसान के दो हाथ ही हैं। विष्णु भगवान के देखे हैं न? चार हाथ हैं। सहस्त्रशीर्षा पुरुषः—उसके हजारों हाथ हैं और आपको हजारों हाथों से इतना देगा, जिसे आप सँभाल भी नहीं पाएँगे। हमारा उदाहरण आप देख लीजिए, हमने अपने आपको खाली कर दिया; भगवान की चीज भगवान् को सौंप दी है और भगवान ने अपनी चीजें हमको सौंप दी हैं। क्या आप ऐसी हिम्मत नहीं कर सकते? आप ऐसी दूरदर्शिता नहीं दिखा सकते? आपको ऐसी बुद्धिमानी नहीं आती? आप ऐसी अक्ल से रिश्ता नहीं जोड़ना चाहते? अगर जोड़ना चाहते हो, तो कृपा कीजिये और आप यहाँ संयमशील बनिए। पैसे के बारे में संयमशील, समय के बारे में संयमशील। आपको समय के बारे में अनुशासित किया गया है न? जब घण्टी बजती है, तब आपको आने के बारे में कहा गया है न? सुबह जब आपको प्रज्ञापेय मिलता है, तब घण्टी बजती है और आपसे यह आशा की जाती है कि आप समय पर पहुँच जाइए।
जब खाने-पीने के लिए घण्टी बजती है, तब आपसे यह आशा की जाती है कि आप बिना समय गँवाये जल्दी पहुँचेंगे। इसी तरह आपको हर टाइम-टेबिल के शिकंजे में कस दिया है। यह अभ्यास है आपका। भावी जीवन में आपको जिस शिकंजे में कसा जा रहा है, उसको आगे भी जारी रखें। केवल यहीं तक यह बातें सीमित नहीं हैं। जीभ को, आपसे संयम के लिए कहा गया है, केवल यहाँ के लिए ही नहीं, बल्कि सारे जीवन के लिए कहा गया है। आप बाहर भी जा करके रहिए। यहाँ एक कमरे में दो आदमियों को रहने की इजाजत नहीं है। अगर स्त्री-पुरुष हैं, तो भी दो कमरों में अलग-अलग रहेंगे; क्योंकि हर आदमी एकाकी बनकर रहे और दूसरी बात यह कि कभी वासनात्मक दृष्टि से एक-दूसरे को न देखें। आप वासनात्मक दृष्टि से मत देखिये। लड़कियाँ कहाँ चली जाएँगी दुनिया से? औरतें क्या मिट जाएँगी और औरतों के लिए मर्द नहीं रहेंगे क्या? मर्द रहेंगे; लेकिन उनके बीच जो जहर है, उस जहर को निकाल दीजिए। जहर निकल जाता है, तो साँप कितना सुन्दर मालूम पड़ता है! देखने में कितना अच्छा लगता है? और जहरीला होता है, तो काट खाता है।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)
अमृतवाणी-174
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आत्मावलोकन का सरल उपाय-एकान्तवास-(भाग-8)
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🔶 अगर आपने नारी के बारे में विकृत विचार बना रखे हैं, तो नारी आपको काट खायेगी डाकिन की तरह और साँपिन की तरह डस लेगी; आपका स्वास्थ्य खराब कर देगी, आपकी अक्ल को खराब कर देगी, आपके चिन्तन को भ्रष्ट कर देगी और आपको लम्पट बना देगी, अगर आपका दृष्टिकोण गलत है तब। अगर आपने दृष्टिकोण सही कर लिया तब? तब वही नारी आपको देवता की तरह वरदान दिया देगी। शिवाजी को एक नारी ने ही देवता जैसा वरदान दिया था, आपको याद होगा। आप ऐसा नहीं कर सकते? आप चिन्तन को बदलिये, नहीं तो आप यहाँ किसलिए आए हैं? यहाँ भी नहीं करेंगे, तो क्या करेंगे? केवल मात्र चिन्ह-पूजा करते रहेंगे? टाइमपास करते रहेंगे? नहीं, टाइमपास मत कीजिए, चिन्ह-पूजा मत कीजिए। अपने सारे-के चिन्तन को आमूल-चूल परिवर्तन करने की कोशिश कीजिए।
🔷 ब्रह्मचर्य के बारे में विचार और चिन्तन करते रहिए। बीच में जब कभी भी आपकी आँखें खुलें, फालतू समय हो और नारी का विचार आये, तो केवल बेटी की दृष्टि से विचार कीजिए, बहिन की दृष्टि से विचार कीजिए, माता की दृष्टि से विचार कीजिए, यहाँ तक कि अपनी धर्मपत्नी का भी सहकर्मी की दृष्टि से विचार कीजिए। सीताजी और राम वनवास में रहते थे—वह उनकी सहकर्मी थीं और गाँधीजी, कस्तूरबा रहते थे—वह भी सहकर्मी थीं, तो आप ऐसा क्यों नहीं कर सकेंगे? रामकृष्ण परमहंस और उनकी धर्मपत्नी शारदामणि जी साथ-साथ रहे, सारे जीवनभर रहे; लेकिन कभी उन्होंने एक-दूसरे को कामवासना की दृष्टि से नहीं देखा। आप उतना न कर पाएँ, तो कम-से इतना तो कीजिए कि नारियों के प्रति जो आपकी कुदृष्टि जीवनभर रही है, जिससे आपकी आँखों का तेजस् खत्म हो गया है, आप उस तेजस् को फिर से प्राप्त करने की कोशिश कीजिए और अपना चिन्तन बदल दीजिए। आपको यही सब बातें याद करनी हैं।
🔶 आपको यहाँ स्वाध्याय नियमित करने के लिए बताया गया है। आपको यहाँ सत्संग से जोड़कर रखा गया है। आपको कुछ सीखने के लिए और भावी योजनाओं को बनाने के लिए बताया गया है तथा उसके लिए मार्गदर्शन भी किया गया है; उसके लिए आपको तरह-तरह के कार्यक्रम भी दिए गए हैं। आपका यहाँ जो शिक्षण होता है, वह इसी दृष्टि से होता है। आपको रोटी कमाना आता है, नहाना-धोना भी आता है, व्यापार भी आता है, लेन-देन भी आता है, नौकरी करना भी आता है और जो काम नहीं आता, वह हम यहाँ सिखाते हैं।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)
अमृतवाणी-175
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आत्मावलोकन का सरल उपाय—एकान्तवास (अन्तिम
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भावी जीवन की आपकी रूपरेखा क्या हो, आप केवल अपने ही लिए ही नहीं जिएँ, उसमें समाज की भी हिस्सेदारी है, लोगों की भी हिस्सेदारी है, भगवान की भी हिस्सेदारी है, आदर्शों की भी हिस्सेदारी है, धर्म और संस्कृति की भी हिस्सेदारी है—उस हिस्सेदारी को आप कैसे निभा पायेंगे? उसके बारे में शिक्षण, आपका सायंकाल का शिक्षण इस उद्देश्य के लिए है, आप इस उद्देश्य को समझिये। आप घटना को देखेंगे और यहाँ के क्रम को देखेंगे, तो ऊपर ही दृष्टि रह जाएगी। दृष्टि को भीतर ले जाइए, दर्शन समझिये यहाँ के कल्प का और यह मानकर चलिए कि यहाँ कल्प का मतलब है—बदल डालना।
अब आपको यहाँ से बदलते हुए जाना है। घर जाकर आपको अपना बदला हुआ रूप दिखाना है। घर जाकर के आपके भावी जीवन में आपका क्रिया-कलाप और आपका उपक्रम ऐसा होना चाहिए, जिसमें पिछले जीवन से कोई संगति न हो। आप एक, आपका ईमान दो, आपका भगवान तीन, तीन तो आप ही के हैं सहपाठी। इन तीनों के साथ में तो आप सारे जीवन की मंजिल पूरी कर सकते हैं। जरूरी क्या है कि आप दूसरों का दबाव मानें? जरूरी क्या है कि आप दूसरों का दबाव मानें? जरूरी क्या है कि आप दूसरों के बहकावे में आएँ? जरूरी क्या है कि आप दूसरों को प्रसन्न करने की कोशिश करें? अपने ईमान को प्रसन्न कर लीजिए, बहुत है—भगवान को प्रसन्न कर लीजिए बहुत है।
आत्मा और परमात्मा को जो आदमी प्रसन्न कर सकते हैं, सारी दुनिया उनसे प्रसन्न रहती है अथवा चलिए यह मान लें—सारी दुनिया प्रसन्न न भी है, नाराज बनी है, तो उस नाराजगी से कुछ बनता-बिगड़ता नहीं है। आपकी आत्मा नाराज हो, आपका परमात्मा नाराज और सारी दुनिया आपसे प्रसन्न बनी रहे और आरती उतारती रहे, तो उससे कुछ बनने वाला भी नहीं है। यही चिन्तन है, जो आपको एक महीने लगातार अपने मनःक्षेत्र में घुमाते रहना चाहिए। मन को बदलिए, सोचने के तरीके बदलिए, जीवन की कार्य-पद्धति बदलिये। बहुत कुछ बदलना है आपको। अगर बदल डालेंगे, तो मजा आ जाएगा! बस, आज तो मुझे इतना ही कहना था आपसे।
॥ॐ शान्ति:॥
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)
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