मन की खिड़की-374
मन की खिड़की खोल रखी है
अब तो आ जाओ गुरुवर
दिल मेरा रहने के काबिल
आकर बस जाओ गुरुवर
भरी जवानी कुछ कर ना पाये
याद तेरी दिल में ना लाये
देख बुढ़ापा रोना आया
तन तो सारा क्षीण हो गया
अब ना कुछ हो पाता है
तेरा ही इन्तज़ार रहता है
मन में तन में हृदय में हरदम
तुमसे मिलने की चाहत है
चाहत अधूरी बात अधूरी
इससे मेरा मन आहत है!!
@शशिसंजय
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें