सलाखों के अन्दर गायत्री साधना-42

"हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता" सचमुच यह कथन बहुत ही सटीक और सत्य प्रतीत होता है। जैसे ही मन्दिर बनाने का सामान आया वैसे ही इन्जीनियर,सलाहकार,मिस्त्री, बेलदार सभी अपना-अपना काम बताने लगे। सभी ने हौसला बढ़ाना शुरू किया, जीजी जब तक ये साहब हैं तब तक पूरा काम हम कर देंगे, अधीक्षक बदलते देर नहीं लगती। आप तो बस सामान डलवाते रहो। सवा दो फीट की मूर्ति के लिये एक छोटा सा मन्दिर बनना था, लेकिन घबराहट इतनी कि जैसे कोई बहुत बड़ी हवेली बननी है। उधारी में सामान डलता रहा। जितना हम लोग निजी तौर पर व्यवस्था कर सकते थे, करते रहे, लेकिन एक समय ऐसा आया जब लगा कि अब सहयोग की जरूरत है। उधर निर्माण में लगे बन्दियों में इतना उत्साह कि उन्होंने मना करने के बावजूद भी थोड़ा बड़ा ढॉचा खड़ा कर दिया। अब उसके लिए ग्रेनाइट, मार्बल,और भी व्यवस्थायें करनी थीं। कुल मिलाकर परीक्षा की घड़ी थी।
गुरु भी जब देते हैं तो परीक्षाएं भी ख़ूब लेते हैं।आसानी से
काम पूरा हो जाये, ऐसा भी नहीं। ख़ैर .... जो भी हो। परीक्षा भी चलती रही और व्यवस्था भी होती रही। वह समय आज भी याद है कि अपने ही लोग....जो एक ही गुरु की सन्तानें हैं बदनाम करने में लगे थे ,कोई कहता महन्त हो गई है, कोई... जेल में कमाने का तरीका तैयार हो रहा है जितने वरिष्ठ, उतनी ही गिरी हुई बातें। न जाने कितने हथकण्डे अपना सकते थे वह सब किया। शान्तिकुन्ज(हम सबका मुख्य गुरुद्वारा) तक शिक़ायत पहुँच चुकी थी इसी के तहत वहॉ से एक वरिष्ठ भाई (जो गुरुदेव के सानिध्य में काफ़ी रह चुके हैं) आये हुये थे क्यों कि बदनामी की ख़ुशबू गुरुद्वारे तक पहुंच चुकी थी, उनके कुछ पूछने पर ऑसुओं का सैलाब फूट पड़ा,(हॉलाकि अपने कहे जाने वाले लोग इसे भी नाटक करार देते आये थे) उन भाईसाहब ने बहुत प्यार से गले लगा कर समझाया कि गुरुदेव न जाने कितने जन्मों के प्रारब्ध केवल छोटी सी बेकार अफ़वाहों से तथा इतना बड़ा काम (जेल में गायत्री मन्दिर बनवाना) कराकर काट रहे हैं।
हमारे पूरे परिवार को प्रोत्साहन दिया तथा बिना किसी को ख़बर किये, जेल में मन्दिर देखकर बन्दियों से बात-चीत करके वापस लौट गये।
हम फिर से उसी उत्साह से अपने काम में जुट गए, लेकिन लगातार 25 वर्षों से सभी जगह वही खींच तान, एक दूसरे को पीछे से वार करना, नीचा दिखाना,यह सभी हरकतें आध्यात्मिक शक्तियों से जुड़ने के बाद व्यक्ति कैसे कर सकता है,समझ नहीं आता।लेकिन आज भी वही सब हो रहा है। समझ नहीं आता कि हम ये क्यों नहीं समझ पाते कि किसी का बुरा करने से हम फिर वही बुरे कर्मों की पोटली आगे के लिये तैयार कर रहे हैं,बेशक कितना भी गुरु का कार्य कर लें, लेकिन कर्म फल तो साथ चलेंगे ही।
                                     क्रमशः!!
                               'गुरुकॄपा केवलम्'
                          "गुरुवर शरणम् गच्छामि"
                                     👣🙏

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

याद आपकी-428

दृष्टा-425

कर्म -426