सलाखों के अन्दर गायत्री साधना-44
गुरुदेव ने मन्दिर में सहायता करने का स्वप्न जिन भाई को दिया था, वे तो घर चले गये लेकिन हम ये सोचने पर मजबूर हो गये कि गुरुदेव को बराबर ख़याल है बेशक वे हमें दिखते न हों।
उनकी दी हुई काया से वे ख़ुद ही अपना काम कराने में व्यस्त हैं और हम कर्ता मानकर दुःखी हुये जा रहे हैं तथा सभी हमें गुनाहगार साबित करने पर भी तुले हुए हैं। ख़ैर....
एक समस्या का समाधान गुरुदेव ने करा दिया। जब हम जेल में रविवार को पहुँचे तो सारा वाक़या हमने बन्दियों को सुनाया, सभी बहुत खुश हो गये और उन भाई से मिलने के लिए कहने लगे,उन्हें समझाया कि जब मूर्ति आयेगी तब वो साथ आयेंगे। उन्हीं बन्दी भाइयों में एक और बच्चा था जो पेशे से डॉक्टर था, जो बच्चे यज्ञ का घी पी जाते थे, प्रसाद खा जा जाते थे, उसी ग्रुप का नेता भी कह सकते हैं, बाद में गुरुदेव का साहित्य पढ़कर उसमें काफ़ी बदलाव आ गया था। उसकी ड्यूटी जेल की डिस्पेंसरी में लगी थी, जो मरीज़ बहुत तकलीफ़ में होते वे उसे बहुत परेशान किया करते।
हम ठीक क्यों नहीं हो रहे, दवाइयां फायदा क्यों नहीं कर रहीं डॉक्टर साहब आदि आदि।
जब डॉक्टर ॠषीकेश ने यह बात बताई तो हमें लगा कि यह बच्चा ईमानदार, अनुशासित, तथा सबका ख़याल रखने वाला है क्यों न एक प्रयोग कराया जाये। हमने उसे कहा कि बेटा जो मरीज़ परेशान हैं तुम उनके पास बैठो और उनके हाथ अपने हाथ में लेकर गायत्री मंत्र मन ही मन बोलते रहो, मरीज़ से कहना मैंने आपकी दवा बदलकर और अच्छी दवाइयां दी हैं। कुछ दिन करके देखो गुरुदेव ज़रूर अच्छा परिणाम देंगे।
डॉक्टर ने रोज़ ऐसा ही करना शुरू कर दिया क्यों कि दवाइयां बदलना इन लोगों के हाथ में नहीं था, वह तो जेल के नियमित डॉक्टर और प्रशासन के हाथ में ही था। हम सबके हाथ में केवल प्रार्थना ही थी, जो उसे करने के लिये बोला। डॉक्टर ने लगातार जपथैरिपी की और परिणाम सुनकर हम सभी स्तब्ध थे। मरीज़ बहुत ही जल्दी स्वस्थ हो रहे थे। अब उसने हमसे कहा कि आप लोग भी डिस्पेंसरी यज्ञ समाप्त करने के बाद आ जाया करिये, सभी मरीज़ आपको याद करते हैं। जब हम डिस्पेंसरी गये तो यज्ञ की विभूति और प्रसाद लेकर गये, प्रसाद खिलाकर विभूति उनके तकलीफ़ वाली जगह लगा दी, तथा हाल पूछने पर डॉक्टर ॠषीकेश की तारीफ़ करते हुए रो-रो कर बताने लगे
कि किस तरह डॉ.साहब ने अच्छी दवाइयां दी हैं और हमें हिम्मत दी, लगातार हमारा हाथ सहलाते रहते थे।
यह सब सुनकर हमारा ख़ुद का भी गला रुँधा हुआ था, मुँह से शब्द नहीं निकल रहे थे। बस डॉक्टर के सिर पर प्यार से हाथ फेरे जा रहे थे, जिसकी प्रार्थना गुरुदेव माताजी ने दिल से सुनी थी। मन्दिर निर्माण में भी उसकी अनोखी भूमिका थी। सभी बन्दी भाइयों में से ड्यूटी लगाना कि कौन क्या-क्या काम करेगा तथा ख़ुद भी पूरी जिम्मेदारी से अपना काम सँभालता। गुरुदेव की आज भी बहुत कृपा है उस पर।
मुझे याद आता है कि जब वह पैरोल पर निकला, तो शान्तिकुन्ज गया सबसे पहले। रिसेप्शन पर जब पूछा कहॉ से आये हो तो छुपाने की बजाय उसने सीधे तौर पर ही बता दिया कि जयपुर जेल से आया हूँ, लगभग 15-16 साल पुरानी बात आज भी याद है कि उसे बहुत कुछ परिचय देना पड़ा, रिसेप्शन पर जो लोग थे उन्होंने जज साहब (डॉ.प्रणव पण्ड्या जी के पिताजी) से फ़ोन करके इसकी बात कराई तब जाकर वह पापा-बाई एवं डॉक्टर साहब और जीजी से मिल पाया। आज भी वह हम सभी का प्यारा डॉक्टर अच्छी सी पत्नी व दो प्यारे से बच्चों का पिता है। बाहर निकलने के बाद गुरुदेव ने उसकी पूरी गृहस्थी बसा दी। शान्तिकुन्ज भी
वह बराबर जाता है।
क्रमशः!!
'गुरुकॄपा केवलम्'
"गुरुवर शरणम् गच्छामि"
👣🙏
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