गुरुगीता-74

चमन लाल मुनीम जी अघोरेश्वर महाप्रभु के साथ ही हाजी सुलेमान जी के बगीचे मडुआडीह,वाराणसी में ही रहते थे | एक दिन मुनीम जी अघोरेश्वर महाप्रभु के साथ सोनारपुरा आये | मन्नार नाम का ड्राइवर बाबा की जीप चला रहा था | उसी समय एक कुत्ता दौड़ता हुआ सड़क पर आया और जीप के नीचे दब के कचट-पचट गया | आस पास के खड़े लोग दौड़ कर जीप को पकड़ लिए |
बाबा ने मुनीम जी से पूछा - " क्या बात है ?"
मुनीम जी ने कहा - " ये लोग कह रहे हैं कि इनका कुत्ता हमारी गाड़ी के नीचे दब कर मर गया है | "
बाबा बोले - " नहीं नहीं ,ई सब चोर हैं | जिन्दा कुत्ता बैठा कर जीप गाड़ी को पकड़ लेते हैं और फिर पैसा मांगते हैं " |
बाबा की ये बात सुनकर भीड़ में से एक आदमी क्रोधित हो कर मरे हुए कुत्ते के पास जा कर,उस कुत्ते की अंतड़ी वगैरह सब अपने हाथों में उठा कर बाबा के समक्ष प्रस्तुत हुआ और कहा - " ठीक से देखो ! ये कुत्ता मरा हुआ है कि नहीं  ? "
जैसे ही कुत्ते के मृत शरीर पर बाबा कि दृष्टि पड़ी,वह जिन्दा हो कर उस आदमी के हाथ से छूटकर सड़क से भाग गया | इसके बाद हम लोग मोटर लेकर तुरंत मंडुआडीह चल दिए,
सोनारपुरा का वह आदमी जिसने मरे हुए कुत्ते को उठा रखा था वो 10-12 आदमी को लेकर अघोरेश्वर महाप्रभु का पता पूछते हुए करीब 1.30 बजे रात में मंडुआडीह पहुंचा और बाबा के चरणों में साष्टांग प्रणाम कर के बोला कि - " हमने आपको पहचाना नहीं,हमसे गलती हो गयी " |
तब बाबा ने टालते हुए कहा कि - " अरे वहां हम नहीं थे कोई और रहा होगा,अब यहाँ से जाओ रात बहुत हो गयी है " |
"अनहोनी होनी करे,राख गुरु के नाम"

गुरुगीता पाठ
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गुरुभक्तिस्तथा ध्यानं सकलं तव कीर्तितम् ।
अनेन यद् भवेत् कार्यं तद्वदामि महातप: ।।80।।
अर्थ
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गुरु भक्ति और गुरु ध्यान सब तुमसे कहा है। इसके द्वारा जो कार्य होता है वह महाधर्म अब मैं कहता हूँ ।।80।।
80.
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I have described to you the devotion and meditation of the Master and now. O ! embodiment of asceticism. I further narrate to you the great benediction that is achieved by following it.
                                    👣🙏

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