गुरुगीता-76

एक समय एक व्यक्ति ने आनन्दमयी माँ के समक्ष मन्त्र दीक्षा प्रदान करने हेतु प्रार्थना की। माँ ने उन्हें दीक्षा के पूर्व भगवन्नाम का सुनिश्चित संख्या में लिखने का आदेश दिया तथा कहा कि नित्य नियमानुसार लिखते हुये व गणना रखते हुये सुनिश्चित संख्या पूर्ण हो जाने पर माँ उन्हें दीक्षा प्रदान करेंगी। उन्होंने नित्यप्रति पुस्तक में क्रमबद्ध रूप से लिखना प्रारम्भ किया। प्रारम्भ में वे नियमित गणना रखते रहे। किन्तु कुछ समय व्यतीत हो जाने पर उन्होने मन्त्र लेखन करते हुये गणना पूर्ण होने पर ध्यान नहीं दिया। कुछ माह पश्चात् वे वाराणसी आश्रम गये। माँ भी वहाँ पधारी हुई थीं। एक दिन प्रातःकाल वे अपना भगवन्नाम लेखन पूर्ण कर आश्रम के अन्नक्षेत्र में गये। भोजन के लिये वे जैसे ही बैठे कि माँ का संदेश प्राप्त हुआ, “शीघ्र चलिये। माँ बुला रही हैं,” वे तत्काल उठ कर माँ के कक्ष की ओर गये। वहां माँ प्रसन्नचित्त इन्हीं की राह देख रही थीं। माँ ने कहा “स्वयं को तैयार कर लो। कल तुम्हारी दीक्षा होगी।” अत्यन्त हर्षित, किन्तु अचानक निर्मित इस स्थिति से कुछ-कुछ भ्रमित से वे अपने कक्ष में लौटे। तभी उन्हें लिखित भगवन्नाम की गणना करने का विचार आया। सभी लिखित पुस्तकों का निरीक्षण करने पर उन्होंने पाया कि संख्या पूर्ण हो चुकी थी किन्तु इसका उन्हें भान भी नही रहा था। यद्यपि गणना में उनसे चूक हो गई थी, किन्तु माँ से नही।
यह केवल समर्थ गुरु के लिए ही संभव है, वे अपने शिष्यों का ध्यान प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों ही रूपों में रखते हैं ।

गुरुगीता पाठ
=========
इदन्तु भक्तिभावेन पठ्यते श्रूयतेsथवा।
लिखित्वा वा प्रदीयते सर्वकामफलप्रदम् ।।82।।
अर्थ
===
"गुरु गीता" नामक पाठ का यह रत्न भक्ति के साथ इसे सुनकर या इसे लिखित रूप में दूसरों को देकर सभी वांछित फलों को प्राप्त करता है।।82।।
82.
===
This gem of the text called "Guru Geeta" bestows all the desired results by reciting or
listening to it with devotion or by giving it to the others in writing.
                                      👣🙏

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

याद आपकी-428

दृष्टा-425

कर्म -426