दिले शायरी-59

---दोनों हाथों को फैलाकर जब मॉगता हूँ दुआ तुमसे,       सोचता हूँ बराबर कि क्या कुछ नहीं दिया तुमने!!

---तुम्हारे दर पर सज़दा करने का ढंग भी निराला है,    झुकता हूँ चरणों में जब तेरे ख़ुद ब ख़ुद सुकून आता है!!

---रिश्ता तेरा और मेरा अभी का नहीं जन्मों का है,
    मग़र हर बार मैं भूल जाता हूँ तुम पहचान लेते हो!!

---इक दुआ कबूल कर लो हर जन्म हम मिलते रहें,
    तेरी सरपरस्ती में ये चिराग सदा जलते रहें!!

---मैं अच्छा हूँ कि बुरा हूँ मालूम नहीं मुझको,
    इनायतें बख्शी हैं तुमने जैसा भी हूँ तुम्हारा हूँ!!

---तेरी याद हमेशा ही तड़पाती रहे मुझको,
    रहमतों का दर है भूलूँ ना कभी तुमको!!
                                            @शशिसंजय
                              

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