सलाखों के अन्दर गायत्री साधना-43
धीरे-धीरे मन्दिर का ढॉचा खड़ा हो गया। अब बारी थी मूर्ति की व्यवस्था करने की। जिन जानकारों ने वादा किया था, वे भी अपने वादे से मुकर गए, अब क्या करें,समझ नहीं आ रहा था।तभी प्रेरणा हुई कि मूर्ति बनाने का कह दिया जाए, और यह विचार आते ही हम एक कार्यकर्त्ता भाई को साथ लेकर मूर्तियों के बाज़ार के लिए निकल पड़े। काफ़ी दुकानों पर मोल भाव के बाद एक दुकान पर साढ़े तीन फीट की मूर्ति बनाने का कह दिया। इधर दिमाग परेशान कि व्यवस्था
होगी कैसे ?
कभी-कभी गुरु पर दृढ़ विश्वास होते हुये भी घबराहट, अज़ीब सी बेचैनी (ऐसा सब कुछ जो शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता) होने लगता है। फ़िर भी पतिदेव बार बार हिम्मत बधाते हुये कहते कि गुरुदेव ने शुरू कराया है तो पूरा भी वही करेंगे (दरअसल 1996 में गुरुदेव ने पतिदेव को स्वप्न में निर्देश देते हुए मंदिर बनाने के लिए कहा था,यह स्वप्न भी शाँतिकुन्ज परिसर में ही इन्हें आया था) कहाँ बनेगा, कैसे बनेगा, यह कुछ भी मालूम नहीं था। इन्होंने जीजी (गुरुदेव की बिटिया) से जाकर पूरा स्वप्न कह सुनाया ।
जीजी ने कहा कि भइया गुरुदेव ने कहा है तो अवश्य ही
पूरा होगा, इन्तज़ार करो। लेकिन इन्हें इतनी बेचैनी कि जितने भी वरिष्ठ भाई या बहन मिलतीं, तो उन्हीं को पूछने
लग जाते, लेकिन किसी के पास भी कोई जवाब नहीं होता था। वक्त गुजरता गया और सन् 2001 में निर्माण कार्य किन परिस्थितियों में शुरू हुआ ये आप पहले पढ़ चुके हैं।
उस समय तक हम सभी उस स्वप्न को पूरी तरह भूल चुके थे। गुरुदेव के हाथों की कठपुतली की भॉति चले जा रहे थे, न बच्चों की परवरिश का ध्यान न दुनियां की परवाह। बस एक जुनून सवार था कि जो काम हाथ में आया है वह बिना विघ्न के गुरुदेव पूरा करा दें। हमारे एक परिचित जिन्होंने वादा किया था कि मेरे लायक कोई भी काम हो तो बताइयेगा। हम लोग उनके यहाँ पहुँचे लेकिन अफ़सोस ! उन्होंने घर के अन्दर से ही हमें देखकर बच्चे से कहलवाया कि घर पर कोई नहीं है।उन्हें यह नहीं पता था कि हमने उनकी आवाज़ सुन ली थी, अपने बच्चे से कहते हुये। हमारे घर से लगभग 20-22 किलोमीटर की दूरी पर था उनका घर। वापस हम अपने घर लौट आये। आते ही बच्चे खाना खाने के लिए कहने लगे लेकिन खाने के बदले रोना आ रहा था कि कितना अपमान, कितनी बदनामी और अपराध कुछ है नहीं। बस एक ही अपराध था कि वरिष्ठों के मना करने (जेल भी कोई जगह है काम करने की) पर भी हमने बन्दियों के बीच जाकर गायत्री यज्ञ, साहित्य, साधना का काम शुरू कर दिया था। जो उन्हें नागवार गुजरा। ख़ैर......
शाम लगभग 6 बजे अपने ही एक भाई जो गायत्री परिवार से तो नहीं जुड़े थे, लेकिन गायत्री जप करते थे और हम लोगों के साथ अच्छे भावनात्मक संबंध थे। आये और आकर अपना स्वप्न जो अभी दिन में ही देखा था, बताने लगे बोले-दीदी आज तो कमाल ही हो गया स्वप्न में गुरुदेव आये और बोले-बेटा कैसा है। मैंने कहा-गुरुजी अच्छा हूँ, इतना कहते ही गुरुजी ने मुझे पलंग पर खुद बैठते और मुझे हाथ पकड़ कर बिठाते हुए पूछा- कि अग़र तेरा एक्सीडेंट हो जाये और उसमें तेरा सिर फट जाये तो कितना पैसा ख़र्च हो जायेगा लगभग ?
सुनकर मैंने घबराते हुये कहा- कि गुरुदेव पचास हजार रूपये तो लग ही जायेंगे।
इतना सुनते ही गुरुजी चिल्लाते हुए कहने लगे- तुझे अस्पताल में रुपये देना मंजूर है लेकिन (हम लोगों का नाम लेकर) वो लोग मन्दिर बना रहे हैं उसमें मूर्ति नहीं रखवा सकता।
इतना कहकर गुरुजी चले गये और मैं पसीने में तर-बतर उठा, चारों तरफ़ देखा लेकिन कहीं कुछ नहीं, वे भाई फूट-फूट कर रोने लगे तथा किसी जानकार से ढाई प्रतिशत ब्याज दर पर जो रूपये लाये थे हमें देने लगे । हमने बहुत समझाया कि आप ऐसा मत करिए,रुपये लौटा आइये लेकिन उन्होंने कहा कि गुरुजी ने जो कहा है वह झूठ नहीं हो सकता ? मूर्ति तो मेरी ओर से ही रखी जायेगी। तब हमने उन्हें घर रुपये वापस लेकर भेजा कि मूर्ति तैयार होने पर हम आपको लेकर चलेंगे, तभी आप अपने हाथों भुगतान कर दीजियेगा और इस तरंह अचानक ही गुरुदेव ने मूर्ति की व्यवस्था कर दी ।
क्रमशः!!
'गुरु कृपा केवलम्'
" गुरुवर शरणम् गच्छामि"
👣🙏
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