दुनिया के ढँग-379
दुनिया में रहने के ढँग को
अपने ढँग से जोड़ा कर
बिखर न पाये ख्वाब की गठरी
ऐसे सपने बुनता चल
पाप-पुण्य की भाषा को
व्यवहार में अपने तोला कर
दुनिया की परिभाषाओं में
तू अपनी भाषा जोड़ा कर
ज़िन्दा दिल तू रहा हमेशा
अब भी ज़िन्दा दिल को रख
चाह जहाँ हो सबसे ज़्यादा
उनसे अपनापन तू रख
आगे-पीछे की करनी को
साफ़गोई से रक्खा कर
सतगुरु तेरे साथ हैं हरदम
विश्वास अटल ये रक्खा कर!!
@शशिसंजय
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