गुरुगीता-84
शेख फरीद नाम के एक सूफी संत थे। वो बचपन में काफी शरारती थे और उसकी माता प्रतिदिन उन्हें नमाज़ करने को कहती थी, पर वो नहीं करते थे। वो कहते थे कि" मुझे अल्लाह से क्या मिलेगा? मैं क्यों करूँ नमाज़"? उनकी माँ ने कहा कि "अल्लाह तुझे खजूर देगा"। अब शेख फरीद जी को खजूर बहुत प्रिय थे। वो उसका मनपसंद फल था। वह कहने लगा - सचमुच। माँ ने कहा - हाँ। शेख फरीद ने कहा कि देख लो, "अगर अल्लाह ने खजूर नहीं दिए तो मैं कभी नमाज़ नहीं करूँगा"। माता ने कहा -अवश्य देगा बेटा। वो यह चाहती थी कि ये किसी तरह शरारत से पीछा छोड़ दे, नमाज़ तो इसे क्या करनी आएगी इसी बहाने अल्लाह को ही याद कर लेगा और मैं भी अपने काम कर लिया करुँगी।
उनकी माता ने चद्दर बिछा कर ,उन्हें अपनी आँखें बंद कर बस यही दोहराने को कहा कि - "अल्लाह मुझे खजूर दे, अल्लाह मुझे खजूर दे"। शेख फरीद भी यही करते रहे -"अल्लाह मुझे खजूर दे"। माँ अपने काम में लग गयी। उनकी माँ ने थोड़े से खजूर ला कर, उनकी चद्दर के नीचे रख दिए। जब माँ का काम हो लिया तो उसने कहा कि बेटा अब उठ कर देख कि अल्लाह ने खजूर दिए है कि नहीं । जब शेख फरीद ने अपनी आखें खोली तो देखा कि सचमुच खजूर थे ,वे ख़ुशी से झूम उठे ,उन्होंने खजूर खा लिए और रोज़ इसी प्रकार अल्लाह को दोहराते रहते और खजूर खाते रहते।एक दिन उनकी माता खजूर रखने भूल गयी तो उन्होंने देखा कि आज भी फरीद जी खजूर कैसे खा रहे है वे उन्हें डांटने लगी कहा से लाये हो फरीद जी बोले अल्लाह ने तो दिए है में कहाँ से ला सकता हूँ , माँ ने सोचा यह निकम्मा आप लाया है कहीं से। उसने कहा कि सच बता तू कहाँ से लाया है? शेख फरीद ने कहा कि माँ देख यहीं तो पड़े थे, मैं कहीं बाहर तो गया ही नहीं। ये देख उनकी माँ हैरान हो गयी कि सचमुच ये तो करिश्मा हो गया ,बाकई ही परमात्मा ने बहुत ही सुन्दर और स्वादिष्ट खजूर भेज दिए थे । परमात्मा भी जब देखता है कि कोई उसकी बंदगी कर रहा है चाहे किसी लालच में ही सही ,पर कर तो रहा है ,फिर वो भी उसके विश्वास को टूटने नहीं देता अब यह लक्षण हैं फरीद जी की पूर्व जनम की बंदगी का क्योंकि वो पिछले जन्म के संस्कारी हंस थे और ऐसे हंस के लिए पूर्ण ब्रह्म परमात्मा साथ-साथ फिरते हैं। कहते हैं :-
जो जन हमरी शरण है, ताका हूँ मैं दास।
गेल-गेल लाग्या रहूँ, जब तक धरती आकाश।।
गुरुगीता पाठ
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सर्वशान्तिकरं नित्यं बन्ध्यापुत्रफलप्रदम् ।
अवैधव्यकरं स्त्रीणा सौभाग्यदायकं परम् ।।90।।
अर्थ
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यह ग्रन्थ रत्न नित्य सर्व शान्ति कर है, बन्ध्या को पुत्र फल प्रदान करता है, स्त्रियों को वैधव्य से बचाता है और श्रेष्ठ सौभाग्यदायकं है ।।90।।
90.
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This gem of text produces total eternal peace and bestows children to the barren women and protects the women from widowhood and is bestower of extremely good fortune.
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