दिले शायरी - 67

---खेलना रंगों से सुहाता है मुझको
    मग़र पास तुम हो तभी तो मैं खेलूँ
    सतगुरु तुम्हीं ने ये बख्शी है नेमत
     कि रंगों से चरणों को रंगीन कर दूँ

---फूलों की रंगत क्या भाती थी तुम पर
    बरसते थे फूलों के रंग भी तुम्हीं पर
    कैसे बताऊँ मैं रौनक महफ़िलों की
    कि सारी की सारी अदायें तुम्हारी

----कभी तुम हो ठाकुर कभी रामकृष्णा
     कभी तुम हो मोहन  कभी मेरी वीणा
     कभी तुम हो सतगुरु कभी मेरे दाता
     ये सारे ही रंग-रूप भाते हैं मुझको
     होली खेलने को बुलाते हैं मुझको

---- रंग दी चुनरिया मन की तुमने
      अब रंग कोई रहा न बाकी
      दिखने को तो सब दिखते हैं
      उन सब पर हो तुम ही भारी
      ऐसी चुनर तुमने रंग डाली

----मन के मीत तुम तन की प्रीत तुम
     सतगुरु तुम ही सब कुछ हो
     क्या-क्या रंग लगाऊँ ख़ुद पर
     मैं जानत हूँ तुम भीतर ही हो
     दाता मेरे सब-कुछ तुम हो !!
                          @शशिसंजय
    

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