क्यों जनाब - 375

"क्यों जनाब" कहकर मुझको
अक्सर चौंका देते थे पापा
मैं तो रहूँगा साथ ही हरदम
हँसकर कहते थे मेरे पापा
बाई की राखी भेजी है क्या ?
हमेशा फ़ोन पै पूछा करते थे
बाई की और ख़ुद की राखी को
अपने हाथ पै बॉधा करते थे
सबकी बातें ध्यान से सुनकर
दिल में रख लेते पापा
सीधे सच्चे सरल हृदय थे
मेरे ही नहीं वो सबके पापा
बाई थीं समर्पित पापा को
और पापा थे सेवक गुरुवर के
दोनों के तरीक़े अलग-अलग
पर दोनों ही जन सेवक थे
मुँहबोली बेटी थी फ़िर भी
मुझे लाड़-प्यार भरपूर मिला
जो दे सकता ना अब कोई
ऐसे मात-पिता का प्यार मिला
मैं भूल नहीं सकती तुमको
तुम दोनों मेरे दिल में हो
चरणों में अर्पित अश्रुसुमन
आशीष मुझे बस देते रहो !!
                    @शशिसंजय

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