सलाखों के अन्दर गायत्री साधना-52

कहते हैं कि साधक को जिज्ञासु होना चाहिए। ऐसी ही जिज्ञासा कुछ-कुछ बन्दी भाइयों में थी, उन्हीं में से एक यह बालाराम भी था जो बार-बार कुछ न कुछ पूछता ही रहता।
एक जिज्ञासा शान्त होते ही कुछ नयी बात पूछने लगता।
इसी तरह एक दिन पूछने लगा कि रोज़ मैं कितनी माला
किया करूँ, जब उसे बताया कि जितना तुम्हारी परिस्थिति हो, जितना समय मिले उसी हिसाब से कर लिया करो। कम से कम 3 माला तो गुरुदेव ने कहा ही है करने के लिये। नहीं आप बताओ-नहीं आप बताओ की ज़िद करने लगा। तब उसे कहा कि-30 माला कर लिया कर। जब जैसे भी संभव हो, अधिक से अधिक जप किया करो। उसने ख़ुश होकर हामी भरी और माला हर वक्त जेब में रखने लगा। जब भी समय मिलता चलते-फिरते जप करता रहता। बिना किसी हिसाब-किताब के। भक्त और भगवान के बीच कोई मोल-भाव नहीं। अपनी ही धुन में मस्त, अपने ही हाल में मगन। हर किसी की सहायता के लिए हर पल तैयार।
            "एक समय एक व्यक्ति ने आनन्दमयी माँ के समक्ष मन्त्र दीक्षा प्रदान करने हेतु प्रार्थना की। माँ ने उन्हें दीक्षा के पूर्व भगवन्नाम का सुनिश्चित संख्या में लिखने का आदेश दिया तथा कहा कि नित्य नियमानुसार लिखते हुये व गणना रखते हुये सुनिश्चित संख्या पूर्ण हो जाने पर माँ उन्हें दीक्षा प्रदान करेंगी। उन्होंने नित्यप्रति पुस्तक में क्रमबद्ध रूप से लिखना प्रारम्भ किया। प्रारम्भ में वे नियमित गणना रखते रहे। किन्तु कुछ समय व्यतीत हो जाने पर उन्होने मन्त्र लेखन करते हुये गणना पूर्ण होने पर ध्यान नहीं दिया। कुछ माह पश्चात् वे वाराणसी आश्रम गये। माँ भी वहाँ पधारी हुई थीं। एक दिन प्रातःकाल वे अपना भगवन्नाम लेखन पूर्ण कर आश्रम के अन्नक्षेत्र में गये। भोजन के लिये वे जैसे ही बैठे कि माँ का संदेश प्राप्त हुआ, “शीघ्र चलिये। माँ बुला रही हैं,” वे तत्काल उठ कर माँ के कक्ष की ओर गये। वहां माँ प्रसन्नचित्त इन्हीं की राह देख रही थीं। माँ ने कहा “स्वयं को तैयार कर लो। कल तुम्हारी दीक्षा होगी।” अत्यन्त हर्षित, किन्तु अचानक निर्मित इस स्थिति से कुछ-कुछ भ्रमित से वे अपने कक्ष में लौटे। तभी उन्हें लिखित भगवन्नाम की गणना करने का विचार आया। सभी लिखित पुस्तकों का निरीक्षण करने पर उन्होंने पाया कि संख्या पूर्ण हो चुकी थी किन्तु इसका उन्हें भान भी नही रहा था। यद्यपि गणना में उनसे चूक हो गई थी, किन्तु माँ से नही।"
            कुछ इसी तरह की घटना बालाराम के साथ हुई, मंत्र जप करते-करते उसे काफ़ी समय बीत चुका था,लेकिन उसने कोई हिसाब-किताब नहीं रखा। जब भी कोई पूछता कि कितना जप हुआ, तो एक ही जबाब होता कि जीजी ने 30 माला कम से कम करने के लिये कहा था, तो कम से कम इतनी तो है ही, अधिक कितनी हैं पता नहीं ? बाबा  (गुरुदेव)और माताजी जानें। जब भी संभव होता जेब से माला निकालकर जप करने लगता। पैरोल (छुट्टी) मिलने पर जब गॉव गया तो बस में भी लगातार जप करता रहा। गॉव से वापस आकर भी जेल की उसी दिनचर्या में व्यस्त हो गया।
                    एक दिन रात्रि में शैल जीजी ने बैरक में सोते हुए बालाराम को स्वप्न में आकर प्यार भरी फटकार लगाते हुये कहा-अरे (उसका नाम पुकारते हुये) तेरा 24 लाख मंत्र जप पूरा हो गया, तू गुरूदक्षिणा नहीं देगा। स्वप्न में जेल के गायत्री मंदिर में गाय और बछिया बंधी हुई थी और बालाराम उस गाय का दूध दुह रहा था। जैसे ही जीजी की बात सुनी, तो दूध की बाल्टी दूध सहित जीजी के चरणों में रखकर रोने लगा। प्रार्थना करने लगा कि मेरे पास तो आपको देने लायक जेल में कुछ भी नहीं है, मैं तो आपको कुछ भी नहीं दे सकता, मुझे तो यह भी नहीं पता कि कितना जप हुआ। मैं तो जीजी के कहने पर करता रहा। शैल जीजी ने उसके सिर पर हाथ रखा और बोलीं- तेरी जीजी को बता देना। उसने उस गाय के दूध की चाय बनाकर जीजी को पिलाई, जीजी चाय पी रहीं थीं कि अचानक बालाराम की नींद खुल गई।
               जब हम लोग यज्ञ कराने पहुँचे तो बालाराम अपना स्वप्न बताकर ख़ुशी के साथ रोने भी लगा, अब उसे  एक ही बात की चिन्ता थी कि दक्षिणा क्या और कैसे दूँ।  हमने उसे समझाया कि हम लोग तेरी तरफ़ से अंशदान भेज देंगे तो इस बात के लिए भी तैयार नहीं। बाद में मात्र 101/ रुपये भिजवाने के लिए तैयार हो गया। घर आने के बाद उसी दिन उपरोक्त राशि हमने उसके नाम से शान्तिकुन्ज भिजवाई। इस तरह माताजी (गुरुमाता) ने अपनी बात शैलजीजी (गुरुदेव माताजी की बिटिया) के माध्यम से बालाराम तक पहुँचाई और उसे दिशा-निर्देश भी दे दिये।
                                 क्रमशः!!
                           'गुरुकॄपा केवलम्'  
                      "गुरुवर शरणम् गच्छामि"
                                  👣🙏

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