सलाखों के अन्दर गायत्री साधना-50

जप और मंत्र लेखन का काम बहुत तीव्र गति से चल रहा था। सभी के चेहरे एक अलौकिक तेज से चमकते दिखाई
देते थे। बहुत अच्छा लग रहा था यह सब देखकर। लेकिन अब मंत्र लेखन की कापियां उपलब्ध कराने की चिन्ता सताने लगी क्यों कि हर माह लगभग 1000 कापियां मथुरा से मँगानी होती थीं तथा प्रत्येक साधक के लिए उससे भी अधिक लाल रंग के पैन भी लाने होते थे। उनकी श्रद्धा उनका विश्वास बहुत ही दृढ़ था जबकि हम डगमगाये रहते थे कि अब ये व्यवस्था कैसे होगी  ? शायद हमें हमारे कुछ करने का अंहकार हो चला था और इसीलिए यह डर बना रहता था कि अब वे लोग कुछ नयी जरूरत न बता दें। जब कि अन्दर से बहुत ही ख़ुशी और आश्चर्य भी था कि यह सब साधना कितनी शान्तिपूर्ण ढंग से गुरुदेव नियोजित कर रहे थे। लेकिन हमारी अपनी छोटी मानसिकता हमेशा ख़ुशी के साथ घबराहट भी पैदा कर देती थी , जो नहीं होना चाहिये था । धीरे-धीरे समय बढ़ता गया और साधना भी बढ़ती गई। पता नहीं इसके पीछे गुरुदेव का क्या उद्देश्य छिपा था।
                  बालाराम जिसके बारे में पहले भी ज़िक्र किया था, वह भी लगातार जप करता रहता, फैक्ट्री में काम के बीच में जब भी समय मिलता जेब से माला निकालकर जप करने लगता, कभी किसी से झगड़ा-फ़साद नहीं, जितना संभव हो सभी की सहायता करना। लेकिन भीतर ही भीतर घुटता रहता परिवार की चिन्ता सताने लगती कि मॉ-बाप, पत्नी एक बेटा सभी थे लेकिन ख़ुद व भाई अन्दर थे सज़ा में, वह भी निरपराध। इतना भावुक हो जाता कि बात करते-करते रोने लगता, ज्यादातर भाईयों की स्थिति ऐसी ही थी। नवरात्रि साधना के बाद नवमी के दिन सभी लोग उपवास खोला करते, चना- हलुवा का प्रसाद पूरी जेल में बॉटकर फ़िर सभी भाई एक साथ बैठकर उपवास खोलते, पूरी, आलू की सब्जी, हरी मिर्च की सब्जी, मसालेदार काले चने, और हलुवा हम सब मिलकर इनका आनन्द उठाते। ज्यादातर बच्चों को ख़ाना खिलाने के बाद 10-12 बच्चों का ग्रुप ख़ाना परोसकर हम सबके साथ ख़ाना खाने लगा, लेकिन मेरी निगाह सभी को देखते हुए बालाराम पर जा टिकी। उसने खाना शुरू नहीं किया था। उसके हाथ में एक कपड़े की छोटी सी पोटली थी, जिसे दबाकर बैठा था। बहुत बार कहने पर भी जब उसने ख़ाना शुरू नहीं किया तो मैंने पूछा कि- इस पोटली में क्या है  ? उसने जबाब में कहा कि-इसमें मेरी माँ ने रोटी भेजी है, मैं केवल वही खाऊँगा, जैसे-तैसे उसके हाथ से पोटली ली और मैंने उससे कहा कि तेरी मॉ के हाथ की रोटी तू अकेले कैसे खा सकता है और भी तो बच्चों की मॉ हैं वो । सभी खायेंगे उस रोटी को ।इतना कहकर मैने उसकी रोटियों में से सबको एक-एक टुकड़ा दिया तथा हम सबने भी एक-एक टुकड़ा खाया। बाक़ी उसे भी बचा हुआ टुकड़ा दिया ताकि वह भी हम सबके साथ प्रसादी पा सके। इस तरह सभी ने एक साथ ख़ुशी-ख़ुशी प्रसाद खाया। बहुत ही भावुकता के पल थे वे ।
मॉ आख़िर मॉ ही होती है, जिसके हाथों का स्वाद रूखी रोटी में भी उतना ही आता है जितना ख़ूब घी लगी रोटी में। सबके प्रसादी पा लेने के बाद थोड़ा आराम करके शाम की नाद योग साधना की और इसके बाद हम सभी अपने-अपने घरों के लिए रवाना हो गए।   
                                     क्रमशः
                              'गुरुकॄपा केवलम्' 
                          "गुरुवर शरणम् गच्छामि"
                                     👣🙏

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