रंग रंगी है-373
रंग रंगी है मेरी चुनरिया
मैंने तेरे वादों से
आ जाओ तुम अब तो दाता
खड़ी हूँ तेरे द्वारे पै
पहली चुनरिया तुमने दीनी
नई-नवेली काया की
रो-रो कर वो मैंने कर दी
पूरी ही पूरी कीचड़ की
दूजी चुनरिया तुमने दीनी
बाल-लड़कपन खेने की
खेल-कूद में समय बिताया
समझ न मुझको थी कुछ भी
तीजी चुनरिया तुमने दीनी
वंश बढ़ाये जाने की
भरी जवानी नशे में डूबे
कोई फिकर ना मैंने की
चौथी चुनरिया जब ओढ़ी मैंने
तब मुझको रोना आया
रंग-बिरंगा जीवन दिया था
सर धुन-धुन मैं पछताया
मेरे सतगुरु अब रंग दो फिर से
तन और मन गीला कर दो
प्रेम समर्पित रहे ये जीवन
दिल मेरा पीला कर दो
अंहकार ढीला कर दो
अच्छे सुन्दर रंग भर दो!!
@शशिसंजय
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें