अमृतवाणी-179
जीवन-साधना आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य भी (भाग 4)
🔷 आप ध्यान दीजिए और गौर कीजिए। पात्रता का विकास किये बिना न संसार में रास्ता है और न पात्रता का विकास किए बिना आध्यात्मिक क्षेत्र में कोई रास्ता है। आपको अफसर बनना है? बल्कि सर्विस कमीशन के सामने जाइये और अपनी पात्रता साबित कीजिये; अच्छा डिवीजन लाइये और अच्छे नम्बर लीजिये। आपको अच्छा स्थान मिल सकता है। नहीं साहब! हम तो परीक्षा से दूर रहेंगे; हम तो भगवान जी की आरती गाएँगे; हमको अफसर बना दीजिए। नहीं-नहीं, ऐसा नहीं हो सकता। पात्रता विकसित करना बहुत जरूरी है। पात्रता का इससे क्या मतलब है? पात्रता का अर्थ होता है—जीवन को परिष्कृत करना। जीवन को परिष्कृत करने के लिए साधना करनी पड़ती है। भगवान को प्राप्त करने के लिए उपासना और अपने आपको पात्र बनाने के लिए साधना।
🔶 साधना किसकी? अपनी। अपनी से क्या मतलब? अपनी से मतलब यह है कि जो हमारे भीतर जन्म-जन्मांतरों के कुसंस्कार जमे पड़े हैं, उनका परिशोधन करना पड़ेगा, बचकानापन दूर करना पड़ेगा। बच्चे को तो कोई कह नहीं सकता। बच्चा कहीं भी पेशाब कर देता है, कहीं भी खड़ा हो जाता है, कुछ भी करने लगता है, कुछ भी चीज फैला देता है; लेकिन बड़ा आदमी तो न केवल स्वयं सँभल के रहता है, वरन् दूसरों की चीजों को भी सँभालकर रखता है। ये बड़प्पन की निशानियाँ हैं। पात्रता से मेरा मतलब उसी से है। चिन्तन की दृष्टि से सुसंस्कृत और व्यवहार की दृष्टि से सज्जन और सभ्य—इन दो विशेषताओं को अपने भीतर पैदा करे आदमी, तो ये माना जाएगा कि उसने पात्रता का विकास कर लिया।
🔷 पात्रता का विकास अगर कर लिया है, तो संसार में भी इज्जत और भगवान के यहाँ भी इज्जत। पात्रता का अगर आपने विकास नहीं किया तो संसार में भी उपहास और तिरस्कार और भगवान के यहाँ भी नाराजगी। आप कहीं भी, कुछ भी नहीं पा सकते। पात्रता की ओर ध्यान एकाग्र कीजिए। पात्रता आपके हाथ की बात है। उपासना भगवान का अनुग्रह, भगवान के हाथ की बात है; पर साधना तो आपके हाथ की बात है। अपने आपको सुसंस्कारी बनाने के लिए जो भी मुमकिन हो, आप पूरी शक्ति से और पूरी ईमानदारी से मेहनत कीजिए। आपको अनगढ़ और सुगढ़ बनाना है।
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)
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