अमृतवाणी-180

“प्राण शक्ति से ही चेतन तत्व जड़ पदार्थों में व्याप्त होता है। प्रत्येक प्राणी जब तक जीवित है, तब तक श्वास लेता है, और जब श्वास थम जाता है तब वह मृत हो जाता है। प्राण के माध्यम से ही जड़ पदार्थ में चैतन्यता आती है। कामनायें तथा मन की चंचलता प्राण को दूषित करती हैं। अतः मैं तुमसे कहती हूं, नाम जप के साथ-साथ श्वास के प्रति एकाग्रता का अभ्यास करो। यदि प्राण व मन, स्थिर व एकाग्र हो जाये, तब मन उस अनन्त में विस्तारित हो जायेगा और ये सभी वस्तुयें उस सर्वग्राही एक में समाहित हो जायेगीं। यदि प्रत्येक श्वास-प्रश्वास में भगवान का स्मरण करोगे तो तुम्हारे प्राण, मन व शरीर सभी का शुद्धिकरण होगा। भगवद्स्मरण करते हुये श्वास लेने से उसकी कृपा का संकेत अवश्य मिलेगा। “आत्मा, परमात्मा साधारण बुद्धि से परे है किन्तु वह ईश्वर निश्चित ही हमारे लिये हमारे प्राणों की भांति हमारा परिचित है। यदि व्यक्ति अपनी ध्यान साधना में श्वास-प्रश्वास की लय का सहयोग ले तो उसकी साधना शक्ति में तीव्रता आयेगी। अतः व्यक्ति को नित्यप्रति, एकान्त में ध्यान मुद्रा में बैठकर अपने चित्त को अन्तर्मुखी करते हुये, श्वास की लय के साथ, तनाव से रहित होकर सहज जप का अभ्यास करना चाहिये। इस प्रकार दीर्घ काल तक अभ्यास करने से शरीर स्थिर तथा भगवन्नाम व श्वास एकरुप हो जायेंगे। साधक को अनुभव होगा कि वह स्वयं समस्त ब्रह्मांड को व्याप्त करने वाली उस महासत्ता का ही अंश है।”

                             "श्री श्री आनन्दमयी मॉ"

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

याद आपकी-428

दृष्टा-425

कर्म -426