सलाखों के अन्दर गायत्री साधना-49

प्राण प्रतिष्ठा के बाद बन्दी भाइयों में जप और यज्ञ के प्रति और अधिक उत्साह बढ़ गया था, बार-बार एक ही बात कहते कि हम सबका बहुत अच्छा ही होगा। अधिक से अधिक बन्दी भाई गायत्री के अनुष्ठान करने लगे। उतनी ही  अधिक मालाओं की मॉग बढ़ने लगी । अब समस्या यह कि इतनी व्यवस्था कैसे की जाये और बिना माला अनुष्ठान संभव नहीं। जब उन्हें हमारी इस परेशानी का पता लगा तो आपस में ही कुछ बातचीत करने लगे । हमने जब पूछा कि क्या हुआ, तो कुछ बताया नहीं। कहने लगे कि अनुष्ठान के बारे में बात कर रहे हैं कि कौन-कौन और शुरू करेगा  ? हम भी खुश हो गये कि गुरुदेव बराबर इनका उत्साह बढ़ा रहे हैं । जब अगले रविवार को हम यज्ञ के लिये पहुँचे तो ढेर सारी धागे की मालायें तैयार करके रखी हुई थीं, हमने
पूछा कि ये कहॉ से आईं तो उन्होंने बताया कि फैक्ट्री में हमदरियॉ बनाते हैं हमने वहां के इन्चार्ज साहब से पूछकर धागा लेकर ये मालायें तैयार की हैं। सभी मालाओं में गांठें लगाकर 108 मनके तैयार कर दिये गये थे। दिल से उन सभी बच्चों के लिये ख़ूब दुआयें निकलीं जिन्होंने हमें हाथ तंग होने के एहसास से बचा लिया था। बालाराम जिसका ज़िक्र पिछली बार हमने किया था, बेशक बहुत मेहनती, सहनशील,और भावुक भी बहुत था लेकिन सवाल बहुत करता था चूँकि अपने काम में ईमानदार था इसलिए चिन्ता में आ गया कि माला करूंगा तो फैक्ट्री नहीं जा पाऊँगा, प्रशासन की नाराज़गी का शिकार होना पड़ेगा आदि आदि ।
जब यह सारी बात हमसे कहने लगा तो उसे समझाया कि माला को जेब में रख लिया करो और जब समय मिले फैक्ट्री में ही बैठकर कर लिया करो।चलते-फिरते भी कर सकते हो।
इतना कहते ही कुछ ब्राह्मण बच्चे कहने लगे कि ये तो ग़लत है, जप पूर्व दिशा की ओर मुंह करके बैठकर ही करना चाहिए । उन सभी की बात सही थी, लेकिन यह भी सच था कि उन सभी की परिस्थितियॉ ऐसी नहीं थीं और केवल इसी कारण जप न करने दिया जाए तो यह तो और भी ग़लत होता अत: उन्हें समझा-बुझाकर बालाराम को जेब में माला रखने तथा जब समय मिले तब करने के लिये कह दिया, यह सुनकर वह बहुत ख़ुश हो गया और कहने लगा जीजी आपने बहुत बड़ी समस्या हल कर दी । कुछ बच्चे गायत्री मंत्र लेखन के लिए तैयार हुये अत: उन्हें मन्त्र लेखन की कापियां उपलब्ध कराईं । इस तरह साधना का सैलाब उमड़ पड़ा सभी के भीतर। यह केवल गुरु कृपा का ही परिणाम था कि जहाँ इस समाज में कौन कितना पैसे वाला है यह सोचकर सम्मान दिया जाता है वहीं दूसरी ओर बन्दी कहे जाने वाले भाइयों में यह होड़ मची थी कि कौन कितने अनुष्ठान कर सकता है सवालक्ष्य के। सचमुच ऐसा लगता था कि गायत्री माता की मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा के साथ ही गुरुदेव-माताजी ने इन सभी में भी नये सिरे से प्राणों का संचार कर दिया है । सब हर रविवार को हमारे पहुँचते ही एक-दूसरे के बारे में बताते कि रात को बैरक में कौन कितनी देर तक जप कर रहा था ।
                               'गुरुकॄपा केवलम्'
                           "गुरुवर शरणम् गच्छामि"
                                       👣🙏

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