सलाखों के अन्दर गायत्री साधना-48

बीते समय से चल रही भक्त और भगवान की लड़ाई चालू थी, लेकिन आज वह दिन भी आ गया कि हमारे गुरु हमारे भगवान को अपने भक्तों पर दया आ ही गयी और डा.प्रणव पण्ड्या जी के पिताजी श्री सत्यनारायण जी पण्ड्या एवं माताजी श्री मती सरस्वती पण्ड्या (जज साहब और बाई) दिनांक 24/11/2002 के दिन गायत्री माता की मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा कराने के लिए आ गये। बहुत ही भावुकता पूर्ण पल थे वे । सचमुच एक स्वप्न जैसा था यह सब कुछ। कारागार में जब पापा-बाई पहुँचे तो तमाम बन्दी भाई अनुशासन में रहते हुए ख़ुशी से झूमने लगे। प्रणाम का दौर काफ़ी देर तक चलता रहा। बाद में प्राण प्रतिष्ठा का कार्यक्रम शुरू किया गया, डा.ॠषीकेश और अशोक दोनों ही मन्दिर के अन्दर कार्यक्रम में भाग ले रहे थे। सभी बन्दी भाइयों और प्रशासन के लोगों में गज़ब का उत्साह देखते ही बनता था। एक और नींव का पत्थर यदि मैं कहूँ तो वह था बालाराम,जिसने मन्दिर निर्माण में पत्थर, सीमेंट, लोहा आदि सब कुछ ढोने और लगातार जप भी करने का बीड़ा उठा रखा था। प्रशासन की डॉट-फटकार के बाबज़ूद भी कभी उसके चेहरे पर निराशा के भाव नहीं देखे। हमेशा उत्साह से भरपूर।
जज साहब ने प्राण प्रतिष्ठा स्वयं कराई, बन्दी भाइयों का हौसला बढ़ाया तथा अपने उद्बोधन से सभी को इतना भावुक कर दिया कि बन्दी भाई रोने लगे, उनका बार-बार यही आग्रह कि आप अब कब आयेंगे, आप साल में एक बार तो हमें मिलने आ जायें, पापा ने उन्हें आश्वासन देते हुए कहा कि आने का वादा तो मैं नहीं कर सकता क्योंकि यह व्यवस्था गुरुदेव के हाथों में है यदि वे कभी ऐसी कोई व्यवस्था करेंगे तो हम अवश्य आयेंगे, लेकिन इतना विश्वास ज़रूर दिलाता हूँ कि जब भी तुम लोग शान्तिकुन्ज आओगे तो हम दोनों अवश्य मिलेंगे, तुम सब हमारे बच्चे हो, ये बात हम हमेशा याद रखेंगे और सच में उन्होंने इस वादे को निभाया भी। जब भी कोई भाई पैरोल पर या बरी होने के बाद शान्तिकुन्ज गया तो सबसे पहले पापा-बाई से जाकर मिला। बाई के शरीर त्याग देने के काफ़ी सालों तक वे अकेले भी मिलते रहे, यही उनकी महानता थी। पापा के उद्बोधन के बाद हमने बाई को माइक पकड़ाया तो वे मना करने लगीं। बहुत आग्रह करने पर रुँधे हुए गले से बोली, मेरे बच्चो- मैंने कभी नहीं बोला है लेकिन आज तुम सबको देखकर कि तुम सब इतना अच्छा काम कर रहे हो, मुझे बहुत अच्छा लग रहा है, हमें तो मालूम भी नहीं था कि ये दोनों इतना अच्छा काम कर रहे हैं, मेरा खूब-ख़ूब आशीर्वाद है तुम सबको। जल्दी ही गुरुदेव-माताजी तुम सबको बाहर भेज देंगे ऐसी प्रार्थना करती हूँ, इतना कहकर हाथ उठाकर आशीर्वाद दिया और रोते हुए ऑसू पोंछने लगीं। एक मॉ की अपने बच्चों के लिये तड़प सबको रुला गई,प्रेम के वशीभूत बच्चों पर अपने माता-पिता को देने के लिए कुछ भी नहीं था, तभी एक भाई मन्दिर में जो ग्रेनाइट लगाई थी, उससे रोटी बेलने का चकला बनाकर ले आया, दूसरा भाई (चूँकि जेल प्रॉगण में मोर बहुत हैं) मोर पँखों को इकट्ठा कर रंग-बिरंगे धागों से लपेट कर ले आया। दोनों ने अपने हाथ से बनाया उपहार पापा बाई के चरणों में रख दिया। भगवान तो भाव के भूखे होते हैं, उपहार के नहीं। उन्होंने लेने से जब मना किया तो उपअधीक्षक महोदय ने जबरन उन्हें ये तुच्छ भेंट लेने के लिए निवेदन किया,जिसे उन्हें स्वीकार करना पड़ा।
इस तरह कार्यक्रम सम्पन्न होने के बाद घर आकर पापा-बाई ने अन्न खाना शुरू कराया, यह कहकर प्यार से झिड़कते हुए कि अब ऐसी ज़िद नहीं करना। भोजन और आराम के उपरान्त उसी शाम वे शान्तिकुन्ज के लिए रवाना हो गए ।
इस तरह गुरुदेव भगवान ने अपने भक्त की कामना पूर्ण की।
                क्रमशः!!
                                     'गुरुकृपा केवलम्'
                                  "गुरुवर शरणम् गच्छामि"
                                             👣🙏

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

याद आपकी-428

दृष्टा-425

कर्म -426