अमृतवाणी-193
सन 1947 में सांस्कृतिक एवं राजनीतिक उथल-पुथल प्रारम्भ होने लगी थी। इस समय माँ को लगा कि विश्व कल्याणार्थ विपुल मात्र में ऊर्जा एवं दिव्य कृपावृष्टि के संचार हेतु एक महायज्ञ आयोजित किया जाना चाहिये। अन्ततः इस भाव का क्रियान्वयन वाराणसी आश्रम में सम्पन्न ‘सावित्री महायज्ञ’ से हुआ।
विशुद्ध वैदिक विधि का पालन करते हुये, मन्त्रोच्चारण के मध्य, अग्नि देव को विशुद्ध गौघृत एवं शाकल्य की आहुतियाँ प्रदान करते हुये दिव्य कृपा व ऊर्जा शक्ति का आहृवाहन किया जाना यज्ञ कहलाता है। मानव मात्र के कल्याणार्थ किये जाने वाले इस यज्ञ हेतु अत्यन्त तेजोमय गायत्री मन्त्र का चयन किया गया। यद्यपि इस अनुष्ठान का आयोजन सामान्य स्तर पर प्रारम्भ किया गया था किन्तु शीघ्र ही आभास होने लगा कि मानो यज्ञ के सभी आवश्यक घटक स्वयमेव प्रस्तुत होते जा रहे हैं। अनेकानेक भक्तगण भी स्वेच्छा से अपनी सेवायें दे रहे थे। माँ स्वयं अनुष्ठान के धार्मिक संस्कार निष्पादन में विशेष रूचि ले रही थीं। आगामी तीन वर्षों में समय-समय पर वाराणसी पधारकर माँ यज्ञ कार्य का निरीक्षण करते हुये आवश्यक निर्देश देती रहीं। जैसे-जैसे समय व्यतीत होता गया, यज्ञ के परिमाण एवं ऊर्जा शक्ति में वृद्धि होती चली गई। इस महायज्ञ के निर्विघ्न सम्पादन में सहायक विविध कार्यो संपूर्ण आश्रम के (प्रसाद का निर्माण, आश्रम सुसज्जित करना आदि) में संलग्न सेवकों का मानों एक नगर सा बन गया। 14 जनवरी सन् 1950 के शुभ दिवस इस महायज्ञ की पूर्णाहुति सम्पन्न हुई।
"मॉ आनन्दमयी"
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