अमृतवाणी-194

हर व्यक्ति, हर वस्तु शुद्ध आत्मा है जो पवित्र है, लिंगहीन है तथा शाश्वत शिव है। नाम, रूप और शरीर जो भौतिक है, सारी भिन्नताओं के मूल हैं। अगर तुम नाम और रूप के अंतर को हटा दो, तो सारा विश्व एक है; दो की सत्ता नहीं है बल्कि सर्वत्र एक ही है। सर्वत्र एक है। तुम और मैं एक हैं। न तो प्रकृति है, न ईश्वर और न विश्व; बस एक ही अपरिमेय सत्ता है जिससे नाम और रूप के आधार पर ये तीनों बने हैं। ज्ञाता स्वयं को कैसे जान सकता है? वह नहीं जान सकता। तुम अपने आपको कैसे देख सकते हो? तुम अपने को प्रतिबिंबित भर कर सकते हो। इस तरह यह सारा विश्व एक शाश्वत सत्ता, आत्मा की प्रतिछाया मात्र है। और चूँकि प्रतिछाया अच्छे या बुरे प्रतिक्षेपक पर पड़ती है, इसलिए तदनुरूप अच्छे या बुरे बिंब बनते हैं। अगर कोई व्यक्ति हत्यारा है तो उसमें प्रतिक्षेपक बुरा है न कि आत्मा। दूसरी ओर अगर कोई साधु है तो उसमें प्रतिक्षेपक शुद्ध है। आत्मा तो स्वरूपतः शुद्ध है। एक वही सत्ता है जो कीट से लेकर पूर्णतया विकसित प्राणी तक में प्रतिबिंबित है। इस तरह यह संपूर्ण विश्व एक है; भौतिक, मानसिक, नैतिक, आध्यात्मिक - हर दृष्टि से इस एक सत्ता को ही हम विभिन्न रूपों में देखते हैं, अपने मन से अनेक बिंब इस पर अध्यस्त करते हैं। जिस प्राणी ने अपने को मनुष्यत्व तक ही सीमित रख लिया है उसे ऐसा लगता है कि यह संसार मनुष्यों का है। किंतु जो चेतना के उच्चतर स्तर पर है, उसे यह संसार स्वर्ग सा दीखता है। वस्तुतः एक ही सत्ता या आत्मा अखिल ब्रह्मांड में व्याप्त है। इसका न तो आना होता है न जाना। न यह पैदा होती है, न मरती है और न पुनः अवतरित होती है। आखिर यह मर भी कैसे सकती है? यह जाए, जो कहाँ जाए? संसार और स्वर्ग आदि सारे स्थानों की व्यर्थ कल्पना तो हमने कर रखी है। न तो वे कभी रहे हैं, न अभी हैं और न भविष्य में कभी हेंगे।
                        स्वामी विवेकानंद
              साभार: मैं कौन हूं (पुस्तक से)

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