अद्भुत आश्चर्य जनक किन्तु सत्य-31
शान्तिकुंज हरिद्वार में सन् 1989 ई. मेंं विचार क्रांति के प्रसार के लिए एक स्कूटर टोली बनाई गई।तय यह हुआ कि टोली बलसाड़ से स्कूटर से चलेगी,प्रचार-प्रसार करते हुए शान्तिकुंज पहुंचेगी और तीन दिनों तक वहां रुककर दूसरे रूट से वापस बलसाड़ पहुंचेगी। पूरी यात्रा 25 दिनों की थी। पहले तो टोली में 25 लोगों का जाना तय हुआ था, लेकिन कई कारणों से अन्तत: 9 व्यक्तियों की टोली बनाई गई।
22 अप्रैल को यात्रा शुरू हुई। चार स्कूटरों पर दो-दो व्यक्ति और एक स्कूटर पर एक अकेला आदमी। सभी इस भाव से भरे थे कि अकेले आदमी
वाले स्कूटर पर पूज्य गुरुदेव सूक्ष्म रूप में बैठे हैं। टोली जहां-जहां रुकी, वहां सभी प्रज्ञा परिजनों काभव्य स्वागत हुआ। सभी अमदा में रात्रि विश्राम के लिए रुके। वहां के लोगों द्वारा किए गए स्वागत -सत्कार से सभी गदगद हो गए। एक ने तो इस आशय का पत्र लिखकर घर भेज दिया कि रास्ते भरहमने जो देखा जाना है, जिस तरह से समाहित हुए हैं, उसके बाद जीवन में कुछ देखने-पाने की इच्छाशेष नहीं रह गई है। अब हम यदि जीवित भी न लौटे तो कोई अफसोस नहीं होगा। आप लोग भी चिंता मत करना।
उत्साह और उमंग से भरे सभी शान्तिकुंज पहुंचे, तो उन्होंने देखा कि द्वारर नंबर 2 से लेकर जहां अभी गुरुदेव की समाधि बनी है, वहां तक दोनों तरफ लोग हाथों में फूल लेकर खड़े थे। गेट के अंदर प्रवेश करते ही इनके ऊपर पुष्प वृष्टि होने लगी। सभी अभिभूत हो गये।
तीनों दिन तक शान्तिकुंज में रुककर यह टोली बलसाड़ के लिए रवाना हुई। 3600कि.मी.की इस सड़क यात्रा का वापसी का रुट दूसरा था। ये
लोग रोज 400-500कि.मी.चलकर रात्रि विश्राम करते थे वे रात को 10-11 के बीच खाना खाकर सोते थे और सुबह 4 बजे अगले पड़ाव के लिए निकल पड़ते थे।
गर्मियों के दिन थे, लेकिन तेज़ धूप में भी इन्हें ऐसा लगता था, जैसे एयरकंडीशन गाड़ी में सफ़र कर रहे हों। कहीं कोई थकान नहीं,हर पल तरोताजा। विचार क्रांति के बीज बोता हुआ यह काफिला इन्दौर पहुंचा।शाम के पांच बजे जब ये अगले पड़ाव की ओर चलने को तैयार हुए तो वहां के लोगों ने इन्हें आगे जाने से रोका। कारण यह था कि इन्दौर से आगे दाऊद और उसके आसपास का इलाका भीलों के उत्पात के लिए प्रसिद्ध था। रात के समय इनके द्वारा राहगीरों को लूट कर उनकी हत्या
कर दी जाती थी।
लेकिन युगशिशिल्पियों को मौत का भय भी रोक सका। उन्हें निर्धारित समय के लिए अगले पड़ाव पर पहुंचना ही था। इसलिए स्थानीय लोगों के लाख रोकने पर भी सभी पूज्य गुरुदेव का स्मरण करते हुए आगे बढ़ चले।
रात गहरी होती जा रही थी। सड़क पर दूर-दूर तक सन्नाटा पसरा हुआ था। सड़क के दोनों ओर बड़ी-बड़ी झाड़ियां थीं, जंगल ही जंगल था। पांचों स्कूटर आगे पीछे तेज़ रफ़्तार में बढ़े चले जा रहे थे। अचानक अगले स्कूटर सवार ने गाड़ी की रफ़्तार बहुत धीमी कर दी। उसने हेडलाइट की रोशनी में यह देख लिया था कि सड़क पर एक छोर
से दूसरे छोर तक बड़े-बड़े पत्थर रखे हुए हैं। धीमी गति से बढ़ते हुए उसने दोनों तरफ आंखें गड़ा कर देखा।दांयें-बांयें तहमद लपेटे हुए कुछ लोग नंगे बदन
खड़े थे। सबके हाथों में तीर कमान।
स्कूटर सवार ने स्कूटर नहीं रोका। आंखें बंद करके पूज्य गुरुदेव से जीवन रक्षा की गुहार करते हुए उसने स्कूटर की रफ़्तार बढ़ाई और
दांत भींचकर दो पत्थरों के बीच से स्कूटर निकाल ले गया।
अगले सवार को सुरक्षित निकलते देखकर पीछे आ रहे स्कूटर सवार का हौसला बढ़ा। उसने स्कूटर का हैंडिल हल्के से दांये बांये घुमाकर हेडलाइट की रोशनी सड़क के दोनों ओर डाली। उसने देखा दोनों ओर तीस चालीस के करीब लुटेरे खड़े हैं। सबके नंगे कन्धों पर धनुष है।
सभी स्कूटर सवार एक एक कर सुरक्षित निकल गये। कुछ दूर जाकर सभी एक जगह रुके। एक दूसरे से कहने लगे-लुटेरे भीलों से बचकर निकल पाना परमपूज्य गुरुदेव की कृपा से संभव हुआ है। एक ने कहा-गुरुदेव की महिमा असीम है। उनकी कृपा से एक साथ एक ही क्षण में इतने सारे अंगुलिमालों का विचार परिवर्तन हो गया।
साभार:ई.एम.डी.शांन्तिकुन्ज
हरिद्वार (उत्तराखण्ड)
(अद्भुत आश्चर्य जनक किन्तु सत्य पुस्तक से पृष्ठ संख्या 15)
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