अद्भुत आश्चर्यजनक किन्तु सत्य -29

वर्ष 1986 के प्रारंभिक दिनों में शान्तिकुन्ज से थोड़ी दूर,  रायवाला छावनी में मैं अपनी बीमार पत्नी श्री मती उर्मिला लाल के साथ रहता था। रॉची के एक वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. रमण और कैंसर रिसर्च इन्टीटयूट की रिपोर्ट के अनुसार उन्हें 'ब्लड कैंसर' था। जो दुनिया के लिए आज भी लाइलाज बीमारी है।
                        चिकित्सकों की एक ही राय थी कि  उनकी मृत्यु 6 माह के अन्दर निश्चय है। इसलिए मैं उन्हें रायवाला ले आया था। दिन में दो बार उन्हें 106.4 डिग्री बुखार चढ़ता था,जो किसी भी दवा से थमता नहीं था और लगभग 2 घन्टे रहता ही था। रुड़की मिलिट्री हॉस्पिटल के कर्नल साहब ने भी स्वयं टेस्ट करके 'ब्लड कैंसर' की पुष्टि कर दी थी।
                          तभी रायवाला छावनी के मेजर सक्सैना ने सलाह दी कि अपनी पत्नी का इलाज शान्तिकुन्ज से कराऊँ। उर्मिला जी दिनों दिन दुबली होती जा रही थीं, 18-20 दिनों से खाना बंद था। खाने का प्रयास करते ही उल्टी हो जाती थी। किसी तरह मैं उन्हें जीप में बिठाकर शान्तिकुन्ज ले आया और डॉ.रामप्रकाश पाण्डेय के समक्ष उपस्थित हो गया। निरीक्षण के उपरांत उन्होंने सलाह दी कि माताजी के दर्शन का समय है,अत: मैं पहले सपत्नीक उनके दर्शन कर लूँ, उसके बाद ही चिकित्सा प्रारंभ करवाई जाये।
                        मैं आधे-अधूरे मन से माताजी के दर्शन के लिए चल पड़ा, क्योंकि मेरे मन में धार्मिक गुरुओं के प्रति अच्छी धारणा नहीं थी। अपने पिछले अनुभवों के कारण मैं उन्हें समाज का नासूर मानता था। किसी प्रकार पत्नी को सहारा देकर प्रथम तल वाले उस कक्ष में ले गया, जहाँ माताजी बैठती थीं।
                      पत्नी का रो-रो कर अपना दुखड़ा सुनाया। माताजी ने बड़े स्नेह और दुलार से कहा था-"अरे बेटी, तुझे कुछ भी तो नहीं हुआ है, वैसे ही दुःखी हो  रही है। तू तो अभी बहुत जियेगी और गुरुदेव का कार्य भी करेगी। छोटी सी बीमारी है, पाण्डेय जी से जड़ी-बूटी लेकर ठीक हो जायेगी।"
                       माताजी के शब्दों में न जाने कैसा जादू था कि मैं भाव-विह्वल हो उठा। मेरी ऑखों से ऑसुओं की धार फूट पड़ी। मैंने अपना सिर उनके चरणों में रख दिया। उन्होंने कहा भोजन-प्रसाद लेकर ही जाना। उस समय ऊपर ही भोजन की व्यवस्था थी। पता नहीं कैसे, पत्नी ने भी आधी रोटी खा ली।
                        डॉ. पाण्डेय जी के पास आने पर उन्होंने एक दवा खिलाई और कुछ देर और बैठने को कहा। दस मिनट बाद मेरी पत्नी को ढेर सारी उल्टी हुई। उल्टी इतनी बदबूदार थी कि जैसे कोई जानवर मर कर सड़ गया हो। पास खड़े एक व्यक्ति ने हाथ-मुँह धुलवाया और अपने हाथों से फर्श की सफ़ाई की। मैं सेवा भावना के इस रूप से परिचित नहीं था,सोचा कोई सफ़ाई कर्मचारी होगा। मुझे तो बाद में पता चला कि सफ़ाई करने वाले सज्जन उड़ीसा से आये हुये एक एम. बी. बी. एस. डॉक्टर हैं, जो आदरणीय पाण्डेय जी से आयुर्वेद की शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं।
                       मैं पत्नी को वापस रायवाला ले गया।वहॉं चिकित्सा प्रारंभ हुई और पहले ही दिन बुखार 102 डिग्री से अधिक नहीं बढ़ा। दूसरे दिन केवल 101 डिग्री तक रहा और रात्रि के 2 बजे के आस-पास पत्नी ने मुझे जगाकर कहा कि मुझे खाने को चाहिए, भूख लगी है। मैंने एक सेब के चार टुकड़े किये, आधे ग्लास पानी में उबालकर जूस को ठंडा कर के पीने दे दिया।सेब का जूस पीकर उन्होंने कहा कि वह रोटी खायेंगी।
                           मुझे लगा कि अब उनका अन्तिम समय आ गया है। यही सोचकर मैंने दो रोटियाँ सैंक दीं। पहली रोटी खाते ही उन्हें नशा- सा हो गया और                                                                                                                                           वह बिना हाथ धोये सो गईं। ऐसे,जैसे बेहोश पड़ी हों।
सुबह साढ़े चार बजे मैंने बाबूजी ( डॉ. रामप्रकाश पाण्डेय) को फ़ोन कर सारी बातें बताईं। पिता की तरह थोड़ी डॉट सुनने को मिली और निर्देश हुआ कि यथा शीघ्र,  पत्नी की नींद खुलते ही, शॉतिकुंज लेकर आऊँ।
          शान्तिकुन्ज पहुँचने पर उन्होंने पुन: उर्मिला जी का निरीक्षण किया। दवाइयां बदल दीं और मुझे विशेष निर्देश दिये, जो खान-पान और चिकित्सा से संबंधित थे। उन्होंने कहा कि-ठीक से देखभाल करोगे, तो 10 दिनों में  15 किलो वजन बढ़ जायेगा और शरीर में नई जान आ जायेगी।
                     नकारात्मक सोच में डूबा हुआ मेरा मन अपने-आप से कह उठा "वाह! बड़ा डॉक्टर आ गया, 10 दिनों में 15 किलो वजन बढ़ा देगा।" मुझे क्या पता था कि महाकाल के इस घौंसले में जड़-चेतन सभी केवल उन्हीं की आज्ञा का पालन करते हैं। उनके शिष्य जो कहें, वैसा न हो, यह असंभव है। 10 दिनों के बाद
मैं जब पुन: जॉच कराने आया, तो पाया कि मेरी पत्नी का वजन था 54 किलो। उस दिन वह स्वयं सीढ़ियॉ चढ़कर माताजी के पास आशीर्वाद लेने गईं।
                          6 महीने चिकित्सा के बाद पुनः मिलिट्री अस्पताल रुड़की में कैंसर का टेस्ट किया गया, तो रिपोर्ट देखकर कर्नल साहब देर तक मेरी पत्नी को अविश्वास की दृष्टि से देखते रहे। रिपोर्ट में कैंसर का नामो-निशान नहीं था।
                     इस घटना को 24 वर्ष बीत चुके हैं। आज भी सब कुछ सामान्य है। वंदनीया माताजी की अनुकम्पा से मेरी पत्नी का उत्तम स्वास्थ्य आज भी आस-पास की महिलाओं के लिए एक उदाहरण है।

प्रस्तुति: भास्कर प्रसाद लाल ,साध नगर, पालम        
             कॉलोनी (नई दिल्ली)
साभार: अद्भुत आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से पृष्ठ-13

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

याद आपकी-428

दृष्टा-425

कर्म -426