अमृतवाणी-195
ईश्वर चुंबक है और मनुष्य की आत्मा सुई; पापरूपी मल इसको ढँके रहता है। जैसे ही कोई आत्मा इस मल से रहित हो जाती है, वैसे ही प्राकृतिक आकर्षण से वह ईश्वर के पास चली आती है और सनातन रूप से उसके साथ रहने लगती है, यद्यपि उसका ईश्वर से कभी तादात्म्य नहीं होता। पूर्ण आत्मा अपनी इच्छा के अनुरूप स्वरूप ग्रहण कर सकती है। अगर वह चाहे, तो सैकड़ों रूप धारण कर सकती है, और चाहे तो कोई भी रूप न ले। यह लगभग सर्वशक्तिमती हो जाती है, अंतर केवल इतना रहता है कि यह सृष्टि नहीं कर सकती। सृष्टि करने की शक्ति केवल ईश्वर ही को है चाहे कोई कितना भी पूर्ण क्यों न हो, वह विश्वनियंता नहीं हो सकता; यह काम केवल ईश्वर ही कर सकता है। किंतु जो आत्माएँ पूर्ण जो जाती हैं, वे सभी आनंद से ईश्वर के साथ रहती हैं। द्वैतवादी लोगों की यही धारणा है। ये द्वैतवादी एक दूसरा भी उपदेश देते हैं। “प्रभु मुझे यह दो, मुझे वह दो’’ - ईश्वर से इस तरह की प्रार्थना करने पर इन लोगों को आपत्ति है। ये समझते हैं कि ऐसा नहीं करना चाहिए। अगर मनुष्य को कुछ-न-कुछ वरदान माँगना ही है तो वह ईश्वर से न माँगे, बल्कि छोटे-छोटे देवी-देवताओं अथवा पूर्ण आत्माओं से माँगे। ईश्वर केवल प्रेम के लिए है, यह तो कलंक की बात है कि हम ईश्वर से भी ‘मुझे यह दो, वह दो’ ऐसा निवेदन करते हैं। इसलिए द्वैतवादी कहते हैं कि मनुष्य अपनी वासनाओं की पूर्ति तो निम्न कोटि के देवताओं को प्रसन्न करके कर लें, पर अगर वह मोक्ष चाहता है, तो उसे ईश्वर की पूजा करनी होगी। भारतवर्ष में असंख्य लोगों का यही धर्म है।
स्वामी विवेकानंद
साभार: मैं कौन हूं (पुस्तक से)
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