सलाखों के अन्दर गायत्री साधना-58

गायत्री माता के मंदिर परिसर में नये-नये बन्दी आकर चुपचाप बैठ जाया करते। धीरे-धीरे आपस में घुलते-मिलते। ऐसे ही एक बन्दी भाई सरदार दर्शन सिंह। उम्र लगभग 60 साल। कई बार से लगातार देख रही थी कि यज्ञ शाला में खंभे के सहारे बैठ कर चुपचाप सारा क्रियाकलाप बड़े ध्यान से देखते रहते।
कुछ दिनों तक यही सिलसिला चलता रहा तो एक दिन उनको पास बुलाकर बात की,तो मालूम हुआ कि पत्नी के मर्डर केस में आ गये हैं,इस उम्र में तो दहेज के कारण गलती नहीं हो सकती शाय़द क्रोध अधिक आने पर पत्नी को धक्का दे दिया और वह सीढ़ियों से लुढ़कते हुए नीचे आ गिरी और इस तरह अपराध बन पड़ा। लेकिन अन्दर आने के बाद ग्लानि होना स्वाभाविक था। बहुत रोने के बाद उन्होंने आपबीती सुनाई। उस दिन के बाद वे यज्ञ में शामिल
होने लगे। एक दिन अचानक से बोले - दीदी जी गायत्री माता का नाम मैंने कभी नहीं सुना, वैसे भी हम सरदार लोगों की पूजा अलग तरह की होती है, लेकिन यहां तो माताजी साक्षात विराजमान हैं। मैंने जब पूछा कैसे ? तो उन्होंने झट से गायत्री मंत्र बोलकर सुनाया और बोले कि माताजी ने खुद यह सिखाया है। मैं दिन-रात रोता रहता था माताजी ने
डॉटते हुए कहा कि-जब देखो रोता रहता है,जप क्यों नहीं करता ? मैंने कहा कि मुझे तो बोलना नहीं आता-उन्होंने कहा-रोज बोला कर ! मैं सुबह-शाम
आरती में आने लगा और आज तीसरा दिन है मुझे पूरा मंत्र याद हो गया।
घर से कोई भी मिलने नहीं आता था, धीमे-धीमे गायत्री माता से ही छोटी-छोटी बातें करने लगे।कई बार अन्य बन्दी भाइयों से कह देते कि आज प्रसाद में कचौड़ी आयेगी और सचमुच वही होता। हम लोग कुछ और प्रसाद खरीदते-खरीदते अचानक कचौड़ी
ख़रीद कर जेल पहुंचते और यज्ञ एवं आरती के बाद ज‌ब प्रसाद बंटता तो अन्य बन्दी भाई बताने लगते कि सरदार जी ने पहले ही बोल दिया था कि आज
माताजी ने हम सबके लिए कचौड़ी मंगाई है।
                     एक बार टी.वी.चैनल दिल्ली से कुछ लोग टीम लेकर बंदियों से मिलने आये, उन्होंने बन्दी भाइयों के इन्टरव्यू लिए तथा पूछा कि यहां किस अपराध में पहुंचे तथा गायत्री मंत्र और गायत्री मंदिर बनाने से क्या फर्क पड़ा आप सभी के व्यवहार में ? कुछ भाई ने अपना चेहरा छुपा कर बातें बताईं, कुछ खुलकर सामने आकर बोले। उनमें सबसे पहले सरदार दर्शन सिंह ने हाथ खड़ा कर के कहा-आप लोग मेरा चेहरा और मेरी बातें सभी को दिखा सकते हैं। जिसके सिर पर गायत्री माता का हाथ हो, दुनिया उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकती। उसके बाद उन्होंने अपने जीवन में गायत्री मंत्र व यज्ञ में शामिल होने के बाद क्या परिवर्तन आया।सब कुछ बयां कर दिया, बिल्कुल निर्भीकता से। सबसे बड़ी बात जो उन्होंने कही वह ये कि-दिन रात रोते रहने वाला मैं अपने घर वालों के इन्तजार में रहता था लेकिन गुरु जी माताजी और गायत्री माता साक्षात यहां विराजमान हैं, मुझे अब किसी की जरूरत नहीं,मेरा केस तो यही लड़ लेंगें। धीरे-धीरे उनका स्वभाव भी शांत होता गया और बन्दी भाई भी उन्हें पिता तुल्य प्यार करने लगे।
                                क्रमशः!!
                         "गुरु कृपा केवलमात्र"
                     "गुरुवर शरणम गच्छामि"
                                   👣🙏

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