सलाखों के अन्दर गायत्री साधना
"हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता" गुरुदेव ने इन बन्दी भाइयों के बीच लगातार 24 वर्षों तक जाने, उनके बीच रहकर उनको समझने और समझाने के लिए ही नहीं भेजा होगा वरन् शायद हमारे पूर्व जन्म के भयंकर अपराधों को काटने के लिए ही सम्मान से उनकी सेवा में भेजा होगा ।मुझे आज भी याद है 30 सितम्बर 1994 का वह दिन जब पहली बार उन सभी के बीच जाना हुआ तो दोनों तरफ से अश्रुधारा बह रही थी । गुरुदेव का सन्देश सुनकर वे लोग भी रो रहे थे और हम सब भी । समझ नहीं आ रहा था कि इन सभी से कौन सा रिश्ता है जो इतनी तड़प हम सभी में है ।आखिरकार जेल अधीक्षक महोदय ने कहा- आप लोग बराबर आइये ,यज्ञ करिये और कराइये ,मैं भी शामिल रहा करूँगा । और सचमुच वे बहुत ही अध्यात्मिक इंसान थे ।वे ज्यादातर यज्ञ व उद्बबोधनों में समय रहते शामिल होने का प्रयास करते । भय से अलग अपनेपन का वातावरण था
उन दिनों । हर त्यौहारों पर हमारा वहॉ जाना जरूरी सा हो गया था क्यों कि एक भावनात्मक संबंध जुड़ गया था उन सभी से । और इस तरह प्रत्येक रविवार जाना शुरू हो गया । वे लोग भी इन्तज़ार करने लगे कि रविवार आते ही जप-यज्ञ-ध्यान में शामिल होंगे । यह बात साफ़ थी कि हर भाई या बच्चा अपराधी नहीं था कुछ से आत्मरक्षा के लिए गुनाह बन पड़ा तो कुछ जमीनी विवाद के लिए, कुछ दहेज हत्या में फंसे थे, तो कुछ आदतन भी, लेकिन कुछ सचमुच बेकसूर थे । इस जीवन में उन्होंने कोई अपराध नहीं किया था हमारी ही तरह, पर लगता था कि गुरुसत्ता ने पिछले कर्म भोगने के लिए ही उन्हें यहाँ भेजा होगा । किन्तु-परन्तु जो भी हो गुरुदेव की लीला वे ही समझ सकते हैं ।जिन्होंने हमें उनका सन्देशवाहक बनाकर 24 वर्षो तक शनैः शनैः सजा काटने भेजा तथा उन सभी अपने प्यारे बच्चों को जेल में रहकर सज़ा भोगने भेजा । यह बात साफ़ है कि जो अंतरंग से गुरुदेव और गायत्री से जुड़ गए वे कुछ लोग बाहर निकलकर आज भी उसी मार्ग पर चल रहे हैं । और समाज को भी दिशा दिखाने (गुरुदेव का सन्देश पहुँचाने) का काम बखूबी निभा रहे हैं ।
क्रमशः!
"गुरुवर शरणम् गच्छामि"
👣🙏
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