देते हो-388

देते हो हर पल ही सबको
एहसास न होने देते हो
दुनिया देती जब भी किसी को
सुना-सुना कर देती है
मनहर हो तुम मेरे प्यारे
मन हर कर भी चुप रहते हो
एक छलावन प्यार हमारा
जो दिखा-दिखा कर करते हैं
कुछ ना सीख सके हम तुमसे
शरण में रह कर भी अब तक
थोड़ी सी सत्ता मिल जाए
अंहकार रहता है तब तक
मिलने का ढंग-बोलने का ढंग
सब कुछ बदल-बदल जाता है
तुमने प्यार दिया कितनों को
वह भी प्यार न दे पाता है
रंग-ढंग सब ही बदल जाता है
तेरा दिया भी भूल जाता है !!                            
                      @शशिसंजय

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

याद आपकी-428

दृष्टा-425

कर्म -426